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DKSZC के दो शीर्ष माओवादियों ने किया समर्पण

DKSZC माओवादियों

DKSZC के दो शीर्ष माओवादियों ने किया समर्पण, छत्तीसगढ़ सरकार की समर्पण नीति पर उठे सवाल

माओवादी हिंसा से दशकों से जूझ रहे देश के अंदरूनी हिस्सों में एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना सामने आई है। माओवादियों के DKSZC शीर्ष नेता माला संजीव उर्फ अशोक उर्फ लंगू दादा और उनकी पत्नी पेरुगुला पार्वती उर्फ दीना ने तेलंगाना पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया है। दोनों ही नेता दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (DKSZC) और स्टेट कमेटी के सक्रिय सदस्य रहे हैं और चार दशकों तक संगठन के महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माने जाते थे।

45 वर्षों तक माओवादी संगठन से जुड़े रहे

पुलिस द्वारा जारी किए गए प्रेस नोट के मुताबिक, 62 वर्षीय माला संजीव, मलकाजगिरी (तेलंगाना) के निवासी हैं और वर्ष 1980 से माओवादी संगठन से जुड़े थे। गदर के नेतृत्व में उन्होंने 16 राज्यों में संगठन के प्रचार-प्रसार का काम संभाला। चेतना नाट्य मंडली (CNM) जैसे संगठन के वह प्रभारी रहे, जिसे माओवादियों की वैचारिक रीढ़ माना जाता है।

उनकी पत्नी पेरुगुला पार्वती (उर्फ दीना), जिनकी उम्र 50 वर्ष है, माओवादी संगठन की प्रमुख सांस्कृतिक इकाई में काम करते हुए AGM, DBCM और स्टेट कमिटी सदस्य तक बनीं। उन्होंने हिंदी, तेलुगु और कोया भाषाओं में आदिवासी युवाओं को आकर्षित करने के लिए कई गीत लिखे, जिनके जरिए बस्तर क्षेत्र के सैकड़ों युवाओं को संगठन से जोड़ा गया।

माओवादियों की स्वीकारोक्ति: “इतना बड़ा नुकसान पहले कभी नहीं”

पिछले दो वर्षों में लगातार ऑपरेशनों और सरकारी दबाव के चलते माओवादी संगठन पर गहरा असर पड़ा है। 2024 में लगभग 217, और 2025 में अब तक 417 माओवादी मारे जा चुके हैं। हाल ही में माओवादियों द्वारा जारी की गई एक बुकलेट में स्वीकार किया गया कि “नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद पहली बार इतना बड़ा नुकसान हुआ है”, जिसमें चार सेंट्रल कमिटी मेंबर्स मारे गए हैं।

समर्पण लेकिन तेलंगाना में, क्यों नहीं छत्तीसगढ़ में?

इस समर्पण की सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों नेता वर्षों तक छत्तीसगढ़ के इंद्रावती टाइगर रिजर्व और बस्तर क्षेत्र में सक्रिय रहे। चेतना नाट्य मंडली के माध्यम से इन्होने आदिवासियों को संगठन से जोड़ा। लेकिन समर्पण के लिए इन्होने छत्तीसगढ़ की बजाय तेलंगाना को चुना।

इसने छत्तीसगढ़ सरकार की समर्पण नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने समर्पण नीति में कई बदलाव किए थे – जिसमें बेहतर पुनर्वास, सुरक्षित जीवन, और पुनर्संस्थापन की सुविधा शामिल थी – फिर भी शीर्ष माओवादी तेलंगाना में आत्मसमर्पण कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ को झटका: तेलंगाना की नीति बेहतर?

इस घटनाक्रम के बाद कई जानकारों का मानना है कि तेलंगाना की समर्पण नीति जमीन पर कहीं अधिक भरोसेमंद और प्रभावशाली है। वहीं, कुछ लोगों का यह भी कहना है कि चूंकि इन नेताओं की भौगोलिक जड़ें तेलंगाना में रही हैं, इसलिए वहां जाकर समर्पण करना उनके लिए सहज रहा।

पर सवाल वही है – जब वर्षों तक उनका संचालन क्षेत्र छत्तीसगढ़ रहा, तो आखिर सरकार की नीति उन्हें प्रभावित क्यों नहीं कर सकी?

शांति वार्ता की आड़ में रणनीतिक तैयारी?

इस बीच, माओवादियों द्वारा शांति वार्ता को लेकर तेलंगाना में एक समिति के गठन और लगातार सरकार पर दबाव बनाने के प्रयास भी सामने आए हैं। जानकारों का कहना है कि जब संगठन कमजोर होता है, तभी वह वार्ता की पहल करता है। माओवादी संगठन की मौजूदा रणनीति में अंडरग्राउंड हो जाना और छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंट जाना भी शामिल है।

 

निष्कर्ष: माओवादी संगठन की वैचारिक हार?

इस समर्पण को केवल एक “सुरक्षा जीत” नहीं, बल्कि एक वैचारिक हार भी माना जा रहा है। क्योंकि दोनों नेता चेतना नाट्य मंडली जैसे संगठन से जुड़े रहे, जिसने बस्तर में वैचारिक आधार खड़ा किया। ऐसे में इनका आत्मसमर्पण माओवादियों की आत्मिक हार की तरह देखा जा रहा है।

 

अब छत्तीसगढ़ सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या उनकी समर्पण नीति में अब भी वो विश्वास है जो बड़े माओवादी नेताओं को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित कर सके?

 

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