बस्तर के नारायणपुर में 1976 का स्विमिंग पूल या स्कूल: बस्तर के विकास पर एक कटाक्ष या सच्चाई की तस्वीर ?
बस्तर (छत्तीसगढ़)। जिस देश ने चंद्रमा तक विक्रम लैंडर भेज दिया, वहीं के एक जिले में 1976 में बना स्कूल आज भी बुनियादी सुविधाओं को तरस रहा है। बस्तर के नारायणपुर विधानसभा क्षेत्र में स्थित यह स्कूल न केवल शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि माओवाद अब केवल एक बहाना बन गया है – न कि असली समस्या।
दिल्ली जैसा सपना, Bastar जैसी हकीकत
इस स्कूल की परिकल्पना 1976 में उस समय की गई थी जब भारत आजादी के कुछ ही दशक पीछे था। उस समय इसे एक आदर्श विद्यालय बनाने की सोच थी, जिसमें एक क्लास में पढ़ाई और दूसरी में… स्विमिंग पूल!
हां, आपने सही पढ़ा। एक सरकारी स्कूल में बाकायदा स्विमिंग पूल की परिकल्पना की गई थी। अधिकारी शायद यह सोच रहे थे कि बच्चे शिक्षा की गहराई के साथ भ्रष्टाचार की नदी को तैरकर पार करना भी सीखें।
स्कूल या बहाना?
जब आज आप इस स्कूल को देखेंगे, तो आपको दो कक्षाएं मिलेंगी। पहली कक्षा में पहली से पांचवी तक के बच्चे एक साथ बैठते हैं — एक ही कमरे में। और पढ़ाते हैं एक मात्र शिक्षक, जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं — एक साथ पांच कक्षाओं का सिलेबस निपटा रहे हैं।
दूसरी कक्षा, जैसा बताया गया, स्विमिंग पूल के रूप में मौजूद है। बारिश हो जाए तो उसमें थोड़ा और पानी भर जाएगा। ग्रामीण कभी-कभी बाल्टी से थोड़ा पानी भर देते हैं, ताकि बच्चे “तैरने” का अभ्यास कर सकें। यह व्यवस्था ‘भविष्य की शिक्षा’ का नया प्रारूप मालूम पड़ती है — जहाँ पढ़ाई के साथ-साथ सर्वाइवल स्किल्स भी आ जाती हैं।
बिजली है, मगर बल्ब नहीं
स्कूल में लाइट की व्यवस्था है — कागजों में। मीटर लगा हुआ है, हरे रंग की लाइट जलती है (या कभी जलती थी)। बल्ब फ्यूज है, लेकिन “मौजूद” है। पंखा नहीं है, क्योंकि स्विमिंग पूल की ठंडक से कमरे का तापमान नियंत्रित रहता है। और अगर रोशनी की बात करें, तो छत को जर्जर कर दिया गया है ताकि प्राकृतिक रोशनी छन-छनकर आ सके।
राजनीति और प्रशासन की उदासी
यह नारायणपुर विधानसभा क्षेत्र, जो Bastar , केशकाल, चित्रकूट, अंतागढ़, और कोंडागांव जैसे अनेक क्षेत्रों को प्रभावित करता है, चार बार राज्य को मंत्री दे चुका है। वर्तमान विधायक केदार कश्यप, खुद यहीं के निवासी हैं। फिर भी क्षेत्र की स्थिति यह है कि स्कूल तो बना, मगर शिक्षा न आ पाई।
माओवाद: बहाना या सच्चाई?
हर बार जब विकास की बात होती है, जवाब आता है — “नारायणपुर में माओवाद है।” लेकिन स्कूल के लिए शिक्षक नहीं, अस्पताल के लिए डॉक्टर नहीं, और सड़क के लिए बजट नहीं, तो माओवाद नहीं, प्रशासनिक मंशा की कमी सामने आती है। माओवाद अब समस्या नहीं, बहाना बन गया है — अधिकारियों और नेताओं दोनों के लिए।
अंत में: एक सवाल
जब शहरों में रहने वाले माता-पिता अपने बच्चों के लिए इंटरनेशनल स्कूल की तलाश करते हैं, क्या कभी उन्होंने सोचा कि बस्तर में एक बच्चा पांचवीं की किताब को पहली कक्षा में पढ़ रहा है, और पहली का बच्चा पांचवीं वाले के साथ बैठकर सोच रहा है — कौन सा सिलेबस मेरा है?
निष्कर्ष:
बस्तर के इस स्कूल की तस्वीर सिर्फ इमारतों की नहीं, एक सिस्टम की कहानी कहती है — जो बच्चों के भविष्य पर लापरवाही की मुहर लगाता है। अब वक्त आ गया है कि माओवाद को बहाना बनाकर शासन-प्रशासन अपनी असफलता से न भागे, बल्कि सच्चाई को स्वीकार कर, समाधान की ओर बढ़े।
“माओवाद नहीं, भ्रष्टाचार बना Bastar के असली दुश्मन”
पुराने स्कूल की नई कहानी: क्या Bastar फिर उठ खड़ा होगा ?”
“भ्रष्टाचार की दर्दनाक मिसाल: बस्तर का 1976 वाला स्कूल”
” क्या Bastar के स्कूल में बदलाव संभव है?”