छत्तीसगढ़ के मंत्री के गांव में ही शिक्षा की हालत बदहाल, जर्जर भवन में पढ़ने को मजबूर बच्चे
फरसागोड़ा (बस्तर), छत्तीसगढ़।
छत्तीसगढ़ सरकार शिक्षा के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियां गिनवाने से नहीं चूकती। हर सप्ताह मंत्री और अधिकारी स्कूल शिक्षा में सुधार के दावे करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को पूरी तरह झुठला देती है। बस्तर जिले के फरसागोड़ा गांव में स्थित एक सरकारी प्राथमिक स्कूल की हालत इस बात की गवाही दे रही है कि राज्य में शिक्षा की जमीनी स्थिति कितनी दयनीय है।
फरसागोड़ा वही गांव है जो राज्य के वन मंत्री केदार कश्यप का गृह ग्राम है। इस गांव से महज 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित जुनावाही ग्राम पंचायत की शासकीय प्राथमिक शाला की हालत ऐसी है कि वह किसी भी दिन जानलेवा हादसे का कारण बन सकती है।
जर्जर भवन, टपकती छत और गिरता प्लास्टर
स्कूल की इमारत बुरी तरह जर्जर हो चुकी है। बरसात के मौसम में छत टपकती है, दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं और प्लास्टर जगह-जगह से उखड़ चुका है। हैरानी की बात यह है कि इसी हालत में यहां प्राथमिक कक्षा पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई जारी है और लगभग 23 बच्चे रोजाना इस जानलेवा भवन में शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। स्कूल के शिक्षकों बैसाखूराम सोरी और योगेंद्र पाल कुजूर ने बताया कि वे कई सालों से स्कूल भवन की मरम्मत या नए भवन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अधिकारियों ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की।
मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना में भ्रष्टाचार के आरोप
स्कूल परिसर में मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना के तहत ₹13.84 लाख की स्वीकृति मिलने के बाद एक अतिरिक्त कक्ष निर्माण की शुरुआत हुई थी, लेकिन पिछले दो वर्षों से कार्य अधूरा पड़ा है। केवल बेस डलवाकर निर्माण कार्य रोक दिया गया। सवाल उठता है कि क्या स्वीकृत राशि का पूरा उपयोग किया गया? स्थानीय लोगों का आरोप है कि मुश्किल से 2-3 लाख खर्च कर काम अधूरा छोड़ दिया गया और शेष राशि का कोई हिसाब नहीं है।
पानी की सुविधा भी बेहाल
स्कूल परिसर में लगा हैंडपंप पिछले 5 वर्षों से खराब पड़ा है, वहीं नल जल योजना के तहत लगाए गए नल से कभी पानी आता ही नहीं। मजबूरी में स्कूल के प्यून या तो बाहर से पानी लाते हैं या आसपास के गांवों से इंतजाम किया जाता है।
पालकों में रोष, बच्चों की सुरक्षा पर खतरा
स्थानीय पालक भी सरकार और शिक्षा विभाग की लापरवाही से नाराज़ हैं। उनका कहना है कि कई बार जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से नए भवन की मांग की गई, लेकिन हर बार उन्हें नजरअंदाज किया गया। पालकों को डर है कि अगर छत गिर गई तो मासूम बच्चों की जान खतरे में पड़ सकती है।
एक पालक का कहना था, “अगर मंत्री खुद अपने गांव की स्कूल की हालत नहीं देख पा रहे, तो बाकी जगह की क्या उम्मीद की जाए?”
बड़ा कैंपस, लेकिन सुविधाएं नदारद
जुनावाही स्कूल का परिसर बड़ा है, लेकिन उसमें सुविधाएं न के बराबर हैं। सामुदायिक भवन में भी कुछ कक्षाएं लगती हैं, लेकिन वह भवन भी पूरी तरह से जर्जर हो चुका है।
सरकार के दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
सरकार हर वर्ष शिक्षा के लिए करोड़ों खर्च करने की बात करती है, लेकिन जुनावाही प्राथमिक शाला जैसे उदाहरण यह साबित करते हैं कि ये रकम कहां और कैसे खर्च होती है, यह जांच का विषय है। छत्तीसगढ़ में शिक्षा की वास्तविक स्थिति सरकार के दावों के उलट भयावह बनी हुई है।
निष्कर्ष
राज्य में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले अधिकारियों और नेताओं को फरसागोड़ा जैसे गांवों में जाकर जमीनी हकीकत देखनी चाहिए। जहां एक ओर छत्तीसगढ़ को शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र सरकार की ओर से पुरस्कार मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर मंत्री के ही गांव की स्कूल इस बात की पोल खोल रही है।
यदि समय रहते इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह एक बड़ी दुर्घटना और शिक्षा के क्षेत्र में गंभीर असफलता का कारण बन सकता है।