बीजापुर में माओवादियों का खूनी खेल जारी: दो और ग्रामीणों की हत्या, शिक्षादूतों की हत्या पर भी जारी किया गया माओवादी प्रेस नो
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादी हिंसा एक बार फिर चरम पर है। बीजापुर जिले के तर्रेम थाना क्षेत्र में माओवादियों ने एक बार फिर दो ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी है। मृतकों की पहचान चुटवाई निवासी कवासी जोगा (55 वर्ष) और वाचक निवासी मंगलू कुरसम (50 वर्ष) के रूप में हुई है। माओवादियों ने इन दोनों पर पुलिस के लिए मुखबिरी करने का आरोप लगाया और धारदार हथियारों से हत्या कर दी।
घटना 20 और 21 जुलाई की दरम्यानी रात की है। घटनास्थल पर माओवादियों ने हाथ से लिखा प्रेस नोट भी छोड़ा, जिसमें लिखा था:
> “तर्रेम गांव का खुरसम मंगलू, पुलिस मुखबिरी कर रहा था। पार्टी द्वारा कई बार समझाने के बाद भी नहीं सुधरा, इसलिए मौत की सजा दी गई।”
प्रेस नोट के अंत में हस्ताक्षर था: भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) – जगरगुंडा एरिया कमेटी।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी हत्याएं
बीजापुर जिले में माओवादियों द्वारा हाल ही में कई हत्याएं की जा चुकी हैं। कुछ दिन पहले तीन लोगों की हत्या की गई थी, जिनमें एक 13 साल का छात्र, एक कॉलेज का छात्र और एक ग्रामीण शामिल थे। माओवादियों ने तब भी प्रेस नोट जारी कर मुखबिरी का आरोप लगाया था।
इसके अलावा, 14 जून 2025 को पिलूर गांव के शिक्षा दूत गुरुजी माकड़ा विनोद और टेकामेटा गांव के शिक्षा दूत गुरुजी मैडम सुरेश की भी हत्या की गई थी। अब माओवादियों ने इन दोनों हत्याओं पर भी एक प्रेस नोट जारी कर दावा किया है कि ये दोनों लंबे समय से गोपनीय सैनिक के रूप में सुरक्षाबलों की मदद कर रहे थे।
माओवादियों की दलीलें और सरकार पर आरोप
माओवादी संगठन की ओर से नेशनल पार्क एरिया कमेटी ने जो प्रेस नोट जारी किया है, उसमें दावा किया गया है कि:
2020 से दोनों शिक्षक पुलिस के लिए मुखबिरी का काम कर रहे थे।
27 जून को उन्होंने फोर्स को माओवादियों के डेरे की जानकारी दी थी, जिससे 3 जुलाई को ऑपरेशन हुआ।
इस ऑपरेशन में माओवादियों के कई साथी मारे गए, जिनमें सीवायपीसीएम सोरी करना, डीवीसीएम अनीता अशोक, साथी ज्योति, हेमला रेनू और रिंगो अनीता शामिल हैं।
माओवादी आरोप लगाते हैं कि सरकार गांव के युवाओं को लालच और डराकर मुखबिर बना रही है, ताकि जल, जंगल और जमीन पर कॉर्पोरेट कंपनियों का कब्जा हो सके।
सवाल दोनों ओर से
इस पूरे घटनाक्रम में सवाल कई हैं:
1. क्या शिक्षादूत वास्तव में पुलिस के लिए काम कर रहे थे?
पुलिस और सरकार इस पर खुलकर कुछ नहीं कहती, लेकिन माओवादियों के आरोपों में गंभीरता है। अगर ये सच है, तो क्या उनके परिवार को मुआवजा मिलेगा?
2. क्या ग्रामीणों को जबरन मुखबिर बनाया जाता है?
कई बार यह भी सामने आया है कि फोर्स ग्रामीणों को अपनी तरफ से सूचनाएं देने के लिए मजबूर करती है। सवाल यह भी है कि क्या सुरक्षा बल वाकई में ग्रामीणों को बचा पा रहे हैं?
3. बच्चों का भविष्य क्या होगा?
जिन शिक्षकों की हत्या हुई, वे कई गांवों के बच्चों को पढ़ा रहे थे। आज वे बच्चे डरे हुए हैं। उनके मन में हिंसा और असुरक्षा की भावना बैठ चुकी है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024 में 217 माओवादी मारे गए थे, जबकि 2025 में अब तक 204 माओवादी मारे जा चुके हैं। हजारों की संख्या में माओवादियों ने समर्पण भी किया है। इसमें कई बड़े नाम भी शामिल हैं, जिनमें कुछ की पत्नियों ने भी आत्मसमर्पण किया है।
हाल ही में तेलंगाना में एक महिला माओवादी नेता ने समर्पण कर संगठन की कई गोपनीय जानकारियां सुरक्षाबलों को सौंपीं। इससे माओवादी संगठन की नीति निर्माण प्रक्रिया और आंतरिक रणनीतियों को बड़ा झटका लगा है।
निष्कर्ष
माओवादी हिंसा और ऑपरेशन के बीच सबसे ज्यादा नुकसान आम ग्रामीणों को हो रहा है। कभी पुलिस का मुखबिर होने के शक में, कभी माओवादियों के समर्थक समझकर – बस्तर का ग्रामीण हर दिन दहशत में जी रहा है।
सरकार और सुरक्षाबलों को यह तय करना होगा कि ऑपरेशन के साथ-साथ ग्रामीणों की सुरक्षा और विश्वास को भी प्राथमिकता दें। वहीं माओवादियों को भी यह समझना होगा कि शिक्षा और लोकतंत्र की हत्या, किसी भी विचारधारा की जीत नहीं होती।