क्या इतिहास बदला जा रहा है या अब सच सामने आ रहा है? एनसीईआरटी की नई किताब से उठा बवाल
भारत में इतिहास हमेशा से बहस का मुद्दा रहा है — खासकर जब बात स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास की हो। एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8वीं की नई सामाजिक विज्ञान की किताब “Exploring Society, India and Beyond” ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है — क्या हमें अब तक अधूरा इतिहास पढ़ाया गया?
जहाँ पहले किताबों में मुगल शासकों को महान, सहनशील और प्रगतिशील बताया गया था, वहीं अब नई पाठ्यपुस्तक में उन्हें एक मिश्रित, बल्कि कई बार क्रूर और कट्टर शासक के रूप में चित्रित किया जा रहा है। इस बदलाव ने न केवल शिक्षाविदों, बल्कि आम जनता और राजनेताओं के बीच भी विवाद की लहर खड़ी कर दी है।
तीन मुख्य बिंदु जो विवाद की जड़ बने:
1. अकबर और चित्तौड़ नरसंहार:
नई किताब में बताया गया है कि 1568 में अकबर ने चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी के दौरान लगभग 30,000 निर्दोष लोगों की हत्या करवाई और बचे हुए लोगों को गुलाम बना दिया।
यह सवाल उठता है कि क्या केवल जजिया कर हटाना ही अकबर को “महान” बनाता है?
2. औरंगज़ेब की असहिष्णुता:
जहां पुरानी किताबों में औरंगज़ेब को धार्मिक आस्थावान शासक बताया गया, वहीं नई किताब कहती है कि उसने भाई दारा शिकोह की हत्या, पिता को बंदी, और सोमनाथ, काशी, मथुरा जैसे मंदिरों को ध्वस्त किया।
उसने सिख, जैन, सूफी और पारसी धर्मों को मान्यता नहीं दी।
3. मंदिर तोड़ने के ऐतिहासिक प्रमाण:
नई किताब में बताया गया है कि मुगलों और दिल्ली सल्तनत के शासकों ने सैकड़ों मंदिरों को तोड़ा।
उदाहरण के तौर पर, दिल्ली की कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के बाहर खुदा हुआ है कि इसके निर्माण में 27 हिंदू-जैन मंदिरों को ध्वस्त किया गया।
अगर यह सब आज सच है, तो पहले क्यों नहीं पढ़ाया गया?
अगर पहले पढ़ाया गया इतिहास सही था, तो अब पाठ्यक्रम में बदलाव क्यों?
क्या राजनीति के आधार पर इतिहास को ढाला जा रहा है?
क्या मुगलों का महिमामंडन किया गया, जबकि हिंदू योद्धाओं जैसे शिवाजी, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान का उल्लेख नाम मात्र किया गया?
साल 2021 की एक रिपोर्ट बताती है कि एनसीईआरटी की पुस्तकों में अकबर का जिक्र 97 बार, जहांगीर-शाहजहां-औरंगज़ेब का 32 बार, लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज का सिर्फ 8 बार, और महाराणा प्रताप का एक या दो बार हुआ।
क्या यह बदलाव राजनीति से प्रेरित है?
एनसीईआरटी की स्थापना 1961 में हुई थी। तब से लेकर अब तक कई सरकारें आईं और गईं — पंडित नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक। इन वर्षों में इतिहास का पाठ्यक्रम समय-समय पर बदला गया, लेकिन मुगल शासन को प्रमुखता दी गई।
ब्रिटेन में इतिहास के पन्नों में कभी ये नहीं पढ़ाया जाता कि उन्होंने भारत को कैसे लूटा, या 30 लाख भारतीयों की मौत का कारण बने। वहाँ भगत सिंह को अपराधी बताया जाता है।
पर भारत में, अत्याचारियों को “महान” बताया गया और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को अक्सर हाशिए पर रखा गया।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर का इतिहास
अजमेर शरीफ की दरगाह के पीछे का इतिहास भी अब चर्चा में है।
1911 में प्रकाशित पुस्तक “Ajmer: Historical and Retrospective” के अनुसार, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अफगानिस्तान में जन्मे और भारत में मोहम्मद गौरी की सेना के साथ आए। ये तथ्य भी इतिहास के पन्नों में ज्यादा जगह नहीं पाते।
सच की तलाश या एजेंडा?
अब देश के सामने असली सवाल है:
क्या हमें आज सच्चा इतिहास बताया जा रहा है?
या फिर अब इतिहास को एक नई राजनीतिक सोच के अनुसार बदला जा रहा है?
तीन बातें तो अब स्पष्ट हैं:
1. मुगल काल में मंदिरों को तोड़ा गया — ये तथ्य हैं।
2. औरंगज़ेब और अकबर जैसे शासकों के अत्याचार हुए — इस पर बहस की गुंजाइश नहीं।
3. शिवाजी, प्रताप, चौहान जैसे योद्धाओं को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला।
अब देखना यह है कि क्या एनसीईआरटी इन बदलावों को शैक्षिक सुधार मानेगा या फिर यह बहस सिर्फ राजनीति की भेंट चढ़ेगी?