छत्तीसगढ़ में माओवादियों की हार की कहानी: महासचिव से लेकर 357 नेताओं की मौत तक, माओवादियों ने जारी किया गया 22 पन्नों का बुकलेट
छत्तीसगढ़ में 2024 के बाद बनी भारतीय जनता पार्टी की सरकार के बाद से माओवादियों पर लगातार आक्रामक ऑपरेशन चलाए जा रहे हैं, जिनके परिणामस्वरूप माओवादियों को भारी क्षति उठानी पड़ी है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण माओवादियों के महासचिव बसवराज (बीआर) की मौत है, जिन्हें 21 मई 2025 को अबूझमाड़ के गुंडे कोर्ट के जंगलों में मार गिराया गया। अब माओवादियों ने इस घटनाक्रम और संगठन की वर्तमान स्थिति को लेकर 22 पन्नों का एक बुकलेट जारी किया है।
इस बुकलेट में माओवादी संगठन ने पहली बार स्वीकार किया है कि उन्हें अब तक का सबसे बड़ा नुकसान हुआ है। महासचिव समेत सेंट्रल कमेटी के चार, राज्य समिति के 15, ज़िला समिति के 21, पीएलजीए और जन संगठनों के कुल मिलाकर 357 सदस्य मारे गए हैं। इसमें 136 महिलाएं भी शामिल हैं। माओवादी इस ऑपरेशन को ‘कगार युद्ध’ नाम दे चुके हैं और दावा कर रहे हैं कि यह केंद्र व राज्य सरकारों की साझा कार्रवाई है।
शहीदी सप्ताह का एलान
माओवादियों ने 28 जुलाई से 3 अगस्त 2025 तक “शहीद स्मृति सप्ताह” मनाने की घोषणा की है। इस दौरान पार्टी, पीएलजीए और जन संगठनों को फिर से संगठित करने का आह्वान किया गया है। बुकलेट में यह भी कहा गया है कि मारे गए सभी साथियों के जीवन वृत्त, तस्वीरें और स्मृति चिन्ह उनके परिजनों तक पहुंचाए जाएंगे।
माओवादियों के अनुसार, सबसे ज्यादा मौतें दंडकारण्य क्षेत्र से हुई हैं – कुल 281। बाकी झारखंड, तेलंगाना, उड़ीसा, आंध्र, महाराष्ट्र, एमपी, पंजाब और पश्चिम घाट क्षेत्र से हैं। इसमें 80 कथित फर्जी मुठभेड़, 269 घेराबंदी हमलों, और एक दुर्घटना में मौतें शामिल हैं।
357 माओवादी मारे गए, जिनमें 136 महिलाएं और 31 वरिष्ठ नेता शामिल
अबूझमाड़ में मारे गए महासचिव बसवराज (बीआर) की प्रमुख भूमिका
28 जुलाई से 3 अगस्त तक ‘शहीद स्मृति सप्ताह’ मनाएंगे माओवादी
सरकार का लक्ष्य: 31 मार्च 2026 तक सशस्त्र माओवाद का अंत
बस्तर में PLGA द्वारा ग्रामीणों और शिक्षा दूतों की हत्याएं जारी
टेलीग्राम-शैली बयान में माओवादी बोले – “हम हार नहीं मानेंगे”
बसवराज की भूमिका
मारे गए महासचिव बसवराज उर्फ नबला केसवराव 1973 में क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े थे। वे दंडकारण्य में गोरिल्ला दस्तों के गठन से लेकर केंद्रीय समिति और सैन्य आयोग में उच्चतम स्तर पर काम कर चुके थे। उनकी मौत को माओवादी संगठन एक “ऐतिहासिक क्षति” मान रहा है।
माओवादी बौखलाहट में
संगठन ने यह भी स्वीकार किया है कि इस हानि का दीर्घकालिक नकारात्मक असर पड़ेगा। लेकिन साथ ही यह दावा किया गया है कि माओवादी अब भी गुरिल्ला रणनीतियों और IED हमलों के जरिए “दुश्मन” (सरकारी बलों) को नुकसान पहुंचा रहे हैं। बुकलेट में दावा किया गया है कि पिछले एक वर्ष में माओवादियों ने 75 जवानों को मारने और 130 को घायल करने की घटनाएं अंजाम दी हैं – हालांकि पुलिस इन आंकड़ों को खारिज करती है।
हिंसा की वापसी: शिक्षा दूतों की हत्या
माओवादियों की बौखलाहट का एक और प्रमाण बीजापुर में हाल की घटनाएं हैं, जहां माओवादियों ने दो शिक्षा दूतों की बेरहमी से हत्या कर दी। इससे पहले तीन ग्रामीणों की भी हत्या की गई थी। ऐसा प्रतीत होता है कि संगठन अब फिर से दहशत फैलाकर ग्रामीणों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है।
सरकार की रणनीति पर मजबूती
राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि माओवादियों की यह बेचैनी इस बात का संकेत है कि सरकार की रणनीति कारगर साबित हो रही है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब बस्तर के आदिवासी मारे जा रहे थे, तब ‘शांति समिति’ के नाम पर लोग कहां थे?
निष्कर्ष
माओवादियों द्वारा जारी 22 पन्नों का यह बुकलेट साफ संकेत देता है कि संगठन भारी दबाव में है। अपनी सबसे बड़ी क्षति का सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर वे यह जताना चाहते हैं कि वे अब एक बार फिर से संगठित होने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि सरकार की ओर से स्पष्ट संकेत हैं कि 31 मार्च 2026 तक सशस्त्र माओवादी आंदोलन को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य तय किया गया है।