पंचायत धनियालुड़ में भ्रष्टाचार की परतें खुलती जा रही हैं: एक पंचायत भवन, कई खर्चे, हर साल लाखों की निकासी
छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव, ग्राम पंचायत धनियालुड़, में एक बड़ा घोटाला सामने आ रहा है। यहां के पंचायत भवन को लेकर हर साल लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं—रिपेयरिंग, मेंटेनेंस, बाउंड्री वॉल, पानी की टंकी, कचरा पेटी, टॉयलेट निर्माण—हर मद में पैसा निकाला गया है, और ज़मीन पर इसका कोई ठोस आधार नज़र नहीं आता।
₹3 लाख की मरम्मत, सिर्फ चूना-पुताई!
वर्तमान में पंचायत भवन के मेंटेनेंस के नाम पर ₹2.98 लाख रुपए निकाले गए हैं। लेकिन मौके पर जाकर देखने पर सिर्फ थोड़ी पुताई, चूना मारना और दरवाजों में पेंट किया जा रहा है। मजदूरों के अनुसार, उन्हें काम करते हुए सिर्फ दो दिन ही हुए हैं। दीवारों पर पहले से लगे खड़िस को हटाकर नया चूना मारा जा रहा है। छत और निर्माण की स्थिति मजबूत है, फिर भी हर साल मरम्मत के नाम पर लाखों की निकासी हो रही है।
बाउंड्री वॉल: पहले ₹3.25 लाख, फिर ₹1.73 लाख!
पंचायत भवन की बाउंड्री वॉल साल 2020 में ₹3,25,700 की लागत से बनाई गई। कुल दीवार की लंबाई लगभग 60 फीट है। पर आश्चर्य की बात यह है कि 2022 में इसी बाउंड्री वॉल के नाम पर फिर ₹1,73,000 निकाल लिए गए।
“नया” टॉयलेट निर्माण, पर ढांचा वर्षों पुराना
“Construction of Toilet for Public Institution” के नाम पर ₹44,000 निकाले गए, लेकिन जिस ढांचे की तस्वीर दिखाई जा रही है, वह वर्षों पुराना और जर्जर अवस्था में है। लोहे की रॉड जंग खा चुकी है, टीन सड़ चुका है, और साफ दिख रहा है कि यह नया निर्माण नहीं बल्कि पुराना ढांचा है जिसे ‘नया’ बता कर पैसा निकाला गया।
एक पाइपलाइन के नाम पर कई बार निकासी
ग्राम पंचायत भवन में रनिंग वाटर सप्लाई के नाम पर 2021 में ₹2,14,542 खर्च किए गए थे। लेकिन 2024 में फिर से “न्यू सोर्स ऑफ ड्रिंकिंग वाटर क्रिएशन” के नाम पर ₹40,000 और ₹39,250 निकाले गए। यानी जो काम पहले हो चुका था, उसी काम के नाम पर दोबारा पैसा निकाला गया।
₹50,000 की ‘कचरा पेटी’ और झोलझाल
एक मामूली कचरा पेटी को ₹50,000 में तैयार दिखाया गया है, जिसमें सिर्फ कुछ टीन और जाली का इस्तेमाल हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह काम ₹5,000 में भी किया जा सकता था। पर ₹48,951 की निकासी की गई है।
मेंटेनेंस के नाम पर हर साल बहती गंगा
2020 में ₹43,425
2022 में ₹99,720
2023-24 में ₹1,58,300
2024-25 में अब तक ₹2,98,000
हर साल “मेंटेनेंस ऑफ पंचायत भवन” के नाम पर भारी-भरकम रकम निकाली जा रही है। लेकिन न काम की स्थिति में बदलाव आता है और न ही पंचायत भवन की आवश्यकता के अनुसार भौतिक सुधार दिखते हैं।
सचिव-सर्पंच की भूमिका पर उठते सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस पूरे मामले में पंचायत सचिव की भूमिका सबसे अहम है, क्योंकि सभी निकासी सचिव के माध्यम से होती है। वही निर्माण कार्य की फाइल तैयार करता है, वही ठेकेदार नियुक्त करता है, और वही खर्च को प्रमाणित करता है। सचिव पर “मुख्य खलनायक” होने का आरोप स्थानीय जन ने लगाया है।
निष्कर्ष: पंचायत भवन बना ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’
हर साल पंचायत भवन के नाम पर राशि निकल रही है, लेकिन जमीन पर काम बेहद सीमित है। पुराने निर्माण को नया बता कर, मामूली मरम्मत को भारी मेंटेनेंस बता कर और टॉयलेट, पाइप, कचरा पेटी जैसी मूलभूत चीज़ों पर अनावश्यक खर्च दिखा कर हज़ारों-लाखों की निकासी हो रही है।
यह एक क्लासिक उदाहरण है कि किस तरह गांवों में विकास कार्यों के नाम पर भारी भ्रष्टाचार हो रहा है, और जवाबदेही की सख्त ज़रूरत है।
न्यायिक जांच व रिकवरी की ज़रूरत
अब आवश्यकता है कि इस मामले की जांच हो, भौतिक सत्यापन कराया जाए, और जिन लोगों ने गड़बड़ी की है उनसे वसूली की जाए। साथ ही, इस तरह के मामलों को उजागर करने के लिए जनजागृति भी ज़रूरी है।
“गांव की सरकार यदि जिम्मेदार नहीं है, तो सबसे बड़ा नुकसान गांव के विकास को ही होता है।”