बस्तर में कोठरी नदी पर पुल निर्माण को लेकर आदिवासी विरोध में 

बस्तर

बस्तर में विकास बनाम सुरक्षा: कोठरी नदी पर पुल निर्माण को लेकर आदिवासी विरोध

बेचाघाट, कांकेर: बस्तर की विविधताओं और परतों में छिपे मुद्दों के बीच एक बार फिर से विकास और सुरक्षा की टकराहट सामने आ गई है। कांकेर जिले के छोटे बेठिया के बेचाघाट इलाके में बहने वाली कोठरी नदी के पार 73 गांव बसते हैं, जिनकी रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी करने का मुख्य साधन इस नदी के पार जाने के लिए नावों का उपयोग है।

सरकार ने साल 2022 में ₹9 करोड़ की लागत से कोठरी नदी पर एक बड़ा पुल बनाने का प्रस्ताव रखा था, ताकि दूसरी ओर के 70 से अधिक गांवों के 1 लाख से अधिक निवासियों को सुविधा पहुँच सके। लेकिन स्थानीय आदिवासी, जिन्हें विकास के साथ-साथ बाहरी हस्तक्षेप और पर्यावरणीय नुकसान का डर बना हुआ है, ने इस योजना का कड़ा विरोध किया।

विकास के दावों के खिलाफ ग्रामीण आवाज़

स्थानीय आदिवासी वर्ग का मानना है कि पुल निर्माण से बाहरी लोगों का अतिक्रमण बढ़ेगा, जिससे उनके जल, जंगल और जमीन पर कब्ज़ा जम सकता है। उनका तर्क है कि:

बाहरी घुसपैठ का खतरा: पुल बनते ही बाहरी लोग आसानी से इस क्षेत्र में आ जाएंगे जिससे जंगल की कटाई, वन उत्पादों का लूट और माओवादी गतिविधियों में इज़ाफा हो सकता है।

पारंपरिक साधन पर निर्भरता: बरसात के मौसम में नाव या डोंगी ही आदिवासियों का एकमात्र भरोसेमंद साधन रहता है। सुबह 8 बजे से लेकर शाम 6:30 या 7 बजे तक, रोजाना दर्जनों लोग इसी डोंगी के माध्यम से अपने सामान, राशन, कृषि सामग्री आदि का परिवहन कर लेते हैं।

एक स्थानीय आदिवासी ने बताया, “नदी के पार जाने के लिए हम लोग सुबह 8 बजे से लेकर शाम तक डोंगी का उपयोग करते हैं। अगर पुल बन गया तो बाहरी लोग यहां आ जाएंगे और हमारी पारंपरिक जमीन, जंगल व जल का नुकसान होगा।”

 

पुल निर्माण पर मतभेद

इस मुद्दे को लेकर गांव के लोग कट्टर विभाजित नजर आते हैं। कुछ लोग पुल निर्माण को आधुनिक विकास की आवश्यकता समझते हैं, जबकि बहुत से आदिवासी इस पर खामोश रह जाते हैं या सीधे असहमति जताते हैं।

सहमत वर्ग: कुछ गांव वाले मानते हैं कि बेहतर सड़क और पुल से यात्रा की दिक्कतें कम होंगी, जिससे विकास के नए अवसर मिलेंगे।

विरोधी वर्ग: वहीं कई आदिवासी का मानना है कि पुल से बाहरी हस्तक्षेप बढ़ेगा, जिससे उनके पारंपरिक श्रोतों और पर्यावरण को नुकसान होगा। इस वर्ग का कहना है कि अगर ग्रामसभा और पंचायत से नियमानुसार अनुमति ली जाती, तो इस विरोध की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

 

स्थानीय पत्रकारों और सरकारी अधिकारियों के अनुसार, विकास विरोधी माओवादी भी इस मुद्दे में हाथ डालते दिखते हैं, क्योंकि उनके अनुसार पुल बनने से सुरक्षा बलों की सीधी पहुंच हो जाएगी। इसी संदर्भ में सरकार ने नदी के उस पार तक सुरक्षा बलों के कैंप खोल दिए हैं और सड़क निर्माण का काम भी जारी रखा है।

विकास बनाम जोखिम: सोच का नया मोड़

इस संघर्ष में यह प्रश्न उठता है कि क्या विकास की पैदल राह में स्थानीय आदिवासियों के पारंपरिक साधनों और उनकी सुरक्षा की अनदेखी की जा रही है। बरसात के मौसम में रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आदिवासी नाव या डोंगी पर निर्भर रहते हैं। एक ओर जहाँ बाहरी संसाधनों के आगमन से जीवन स्तर में सुधार की संभावना है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक जीवन और पर्यावरण के संतुलन में खलल पड़ने का डर भी काफ़ी बड़ा है।

आदिवासियों का यह भी मानना है कि पुल बनते ही उनके रोजगार के मौजूदा साधनों में व्यवधान आएगा और उनका आत्मनिर्भरता का आधार कमजोर पड़ जाएगा। गाँव की पुरानी व्यवस्था में मतभेदों के बावजूद, सभी का मुख्य मकसद अपने प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक जीवन शैली की रक्षा करना है।

 

आगे का रास्ता: संवाद और समझौते की आवश्यकता

ग्रामवासियों और सरकार के बीच चल रहे इस तनाव को सुलझाने के लिए संवाद एवं पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया की आवश्यकता है। आदिवासियों का यह अनुरोध है कि पुल निर्माण से पहले उनकी राय शामिल की जाए और ग्राम सभा या पंचायत के माध्यम से उचित अनुमति ली जाए। सरकार के लिए यह जरूरी होगा कि विकास के साथ-साथ स्थानीय सुरक्षा, पारंपरिक जीवन और पर्यावरण संरक्षण का भी पूरा ध्यान रखा जाए।

जैसे-जैसे बरसात का मौसम करीब आता है, कोठरी नदी का पानी और भी बढ़ जाएगा, जिससे डोंगी से पार करना और भी जोखिम भरा हो जाएगा। तब यह प्रश्न और भी गहराता है कि विकास का फायदा किसे मिलेगा और किसे नुकसान उठाना पड़ेगा।

इस रिपोर्ट के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि बस्तर के आदिवासी विकास तथा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए सहयोग, पारदर्शिता और स्थानीय भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता की बेहद ज़रूरत है।

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