पल्लीभाटा स्कूल की बदहाली पर जागी सरकार

पल्लीभाटा स्कूल

पल्लीभाटा स्कूल की बदहाली पर जागी सरकार, स्विमिंग पूल जैसी हालत वाले कमरे में अब नई सीट लगाई गई

बस्तर, छत्तीसगढ़: नारायणपुर विधानसभा क्षेत्र के पल्लीभाटा गांव के एक स्कूल की दयनीय स्थिति को लेकर जब मीडिया में खबर दिखाई गई, तो उसका असर जमीन पर नजर आने लगा। बस्तर जिले का यह स्कूल, जहां दो ही कमरे हैं – एक में पानी भर जाने से स्विमिंग पूल जैसी स्थिति बन गई थी और दूसरे में पहली से पांचवीं तक के बच्चे एक साथ पढ़ाई कर रहे थे – अब प्राथमिक स्तर पर सुधार की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जिससे कि बच्चों को स्कूल में पढ़ने में सहजता होगी।

पल्लीभाटा स्कूल  की खबर को मीडिया ने प्रमुखता से उठाया था, जिसमें दिखाया गया था कि कैसे बारिश के समय एक कमरे में इतना पानी भर जाता है कि बच्चों का बैठना मुश्किल हो जाता है। यह हालत ऐसी थी कि छोटे-छोटे बच्चे फर्श पर बैठने से डरते थे। ऐसी स्थिति में शिक्षा की कल्पना करना भी मुश्किल था। इस रिपोर्ट को जनता ने भी भरपूर समर्थन दिया और सोशल मीडिया पर जमकर शेयर किया, जिससे यह खबर जिम्मेदारों तक पहुँची।

सूत्रों के मुताबिक, इस खबर को देखने के बाद छत्तीसगढ़ के वन मंत्री और क्षेत्रीय विधायक केदार कश्यप ने इस पल्लीभाटा स्कूल की हालत पर तुरंत संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि स्कूल में तत्काल जरूरी इंतजाम किए जाएं। आदेश मिलने के 24 घंटे के भीतर स्कूल में नई सीटें लगवा दी गईं, जिससे अब बच्चों को बैठने की सुविधा मिल गई है और वे बारिश में सुरक्षित रहकर पढ़ाई कर सकते हैं।

हालांकि, अभी भी पल्लीभाटा स्कूल में केवल दो ही कमरे हैं और इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत पूरी तरह से सुधरी नहीं है। लेकिन यह एक सकारात्मक शुरुआत मानी जा सकती है। खास बात यह है कि जिस तेजी से यह निर्णय हुआ, वह प्रशासन की तत्परता को दर्शाता है।

मीडिया रिपोर्टर ने यह स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य सिर्फ सच्चाई को सामने लाना था, न कि किसी तरह का श्रेय लेना। उन्होंने कहा कि उनका काम था तस्वीरें और जानकारी जनता और प्रशासन के सामने रखना। लेकिन जब प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और बच्चों की प्राथमिक ज़रूरत पूरी हुई, तो यह ज़रूर बताना चाहिए कि खबर का असर हुआ।

उन्होंने यह भी अपील की कि सरकार को शिक्षा विभाग के अधिकारियों जैसे डीईओ और बीईओ से रिपोर्ट मंगवानी चाहिए कि ऐसे कितने और स्कूल हैं जहाँ बच्चों को बैठने की सुविधा तक मयस्सर नहीं है। ऐसे स्कूलों की तत्काल पहचान कर मरम्मत और सीट की व्यवस्था होनी चाहिए। अगर एक दिन में एक स्कूल की स्थिति थोड़ी बहुत सुधारी जा सकती है, तो बाकी स्कूलों की मरम्मत भी नामुमकिन नहीं है।

रिपोर्टर ने यह भी भावुक होकर कहा कि जब छोटे-छोटे बच्चे इस तरह के जर्जर स्कूल भवनों में पढ़ते हैं, तो उनके मन में अच्छे स्कूल या मकान की परिकल्पना ही नहीं बनती। ऐसे में वे आगे चलकर समाज में कैसे बदलाव की सोच विकसित करेंगे? अगर उन्हें कभी कोई बेहतर भवन देखने को मिलेगा, तो अफसोस होगा कि उन्होंने अपनी शिक्षा जीवन की शुरुआत किन हालातों में की थी।

इस पूरे घटनाक्रम से यह सीख मिलती है कि मीडिया की जिम्मेदारी निभाने से बदलाव संभव है। जनता की सहभागिता और सरकार की सजगता मिलकर अगर काम करे, तो नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के बच्चे भी एक सुरक्षित और प्रेरणादायक माहौल में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

 

आखिरी में

इस रिपोर्ट को साझा करने वाले दर्शकों और जागरूक नागरिकों को धन्यवाद , जिनकी सक्रियता से यह बदलाव संभव हो सका। यह सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि उस उम्मीद की किरण है जो बस्तर के अन्य उपेक्षित स्कूलों तक भी पहुँच सकती है।

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