रेलवे भर्ती में देरी पर युवाओं का फूटा गुस्सा: “हमारा कसूर क्या है?”
“शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा” — इस कहावत के साथ अपने संघर्ष की शुरुआत करने वाले लाखों भारतीय युवाओं के सब्र का अब बांध टूट रहा है। पढ़-लिख कर सफल होने के सपने संजोने वाले युवाओं को अब सिस्टम की लापरवाही, देरी और चुप्पी थका चुकी है।
सपनों की नींव पर खड़ी रेलवे भर्ती की जमीनी हकीकत
रेलवे, जो भारत के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक है, आज युवाओं की उम्मीदों की कब्रगाह बनता जा रहा है। लाखों युवाओं ने वर्षों की मेहनत की — खेत छोड़े, घर छोड़े, रिश्ते और आराम छोड़े — सिर्फ इस भरोसे पर कि मेहनत का फल मिलेगा। लेकिन हकीकत ये है कि रेलवे की अधिकांश भर्तियाँ वर्षों से अधूरी हैं।
आरआरबी एनटीपीसी 2019 की परीक्षा में ही रिजल्ट आने में चार साल से ज़्यादा का समय लग गया।
ग्रुप डी, टिकट चेकर, स्टेशन मास्टर, ट्रैकमैन, और अन्य तकनीकी पदों पर भर्ती की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है।
अनुमान के अनुसार, 3 लाख से अधिक पद खाली पड़े हैं — बावजूद इसके कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
सोशल मीडिया बना युवाओं की अदालत
पिछले 72 घंटों में, लाखों युवाओं ने ट्विटर (अब X), फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर आवाज़ बुलंद की है।
#Railway_Reforms, #YouthForJob, #TimeBoundRecruitment जैसे हैशटैग्स ट्रेंड कर चुके हैं।
हर पोस्ट में एक कहानी है:
कोई मजदूरी करके रात में पढ़ाई कर रहा है।
कोई बीमार मां-बाप के इलाज के लिए नौकरी की उम्मीद में है।
कोई पहली महिला अधिकारी बनने का सपना देख रही बेटी है।
इन कहानियों के जवाब में, सिस्टम चुप है, सरकार खामोश है, और रेलवे बोर्ड लापरवाह।
युवाओं की 5 बड़ी मांगें क्या हैं?
1. समयबद्ध नियुक्ति प्रक्रिया
परीक्षा, रिजल्ट, डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन और नियुक्ति की निश्चित टाइमलाइन हो।
2. लंबित भर्तियों पर तत्काल कार्यवाही
वर्षों से रुकी नियुक्तियों (जैसे NTPC, ग्रुप D) को तुरंत निष्पादित किया जाए।
3. रिक्त पदों की पारदर्शी जानकारी
रेलवे में कुल कितने पद खाली हैं, उनकी अपडेटेड और सार्वजनिक जानकारी हो।
4. जवाबदेही तय हो
प्रक्रिया में किसी स्तर पर त्रुटि या देरी हो तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो।
5. अधिकतम आयु सीमा में छूट
सिस्टम की देरी की वजह से जो उम्मीदवार आयु सीमा पार कर चुके हैं, उन्हें विशेष छूट दी जाए।
सवाल जो युवाओं को तोड़ रहे हैं, और सिस्टम से जवाब मांग रहे हैं
अगर लाखों पद खाली हैं, तो भर्ती क्यों नहीं हो रही?
परीक्षा के बाद रिजल्ट में सालों की देरी क्यों?
बार-बार नोटिस और बार-बार टालमटोल क्यों?
जवाबदेही किसकी है, और वह जवाब क्यों नहीं दे रहा?
क्या पढ़ा-लिखा युवा अब सिर्फ भाषणों के भरोसे जिएगा?
भर्तियां नहीं, भरोसे का संकट है ये
सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं है। यह उस भरोसे की चिंगारी है जो अब आग बन चुका है। जब एक पूरा प्रशासनिक ढांचा वर्षों तक भर्ती प्रक्रिया को टालता है, तब सवाल सिर्फ प्रक्रिया का नहीं होता — वो लोकतंत्र की आत्मा पर चोट होती है।
रेलवे की सेवाएं भी इसी वजह से प्रभावित हो रही हैं — स्टाफ की कमी के चलते ट्रेनें देर से चल रही हैं, अव्यवस्था है, दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। यानी नुकसान सिर्फ युवा नहीं उठा रहे — पूरा देश भुगत रहा है।
अब वक्त है कि सिस्टम जगने की जरूरत है।
अब सिर्फ बातों से काम नहीं चलेगा। युवाओं को सिर्फ शांत करने के लिए आश्वासन नहीं, ठोस निर्णय चाहिए:
टेक्नोलॉजी में सुधार किया जाए, जिससे रिजल्ट गड़बड़ियों से मुक्त हो।
रेलवे बोर्ड और मंत्रालय के बीच तालमेल सुधारा जाए।
सेंट्रल पोर्टल बनाकर पारदर्शी और लाइव अपडेट उपलब्ध कराए जाएं।
अंतिम बात: युवा अब सिर्फ नौकरी नहीं, इज्जत मांग रहे हैं
भारत का युवा मेहनती है, पढ़ा-लिखा है और देश से प्रेम करता है। वह क्रांति नहीं, संविधानिक रास्ते से बदलाव चाहता है।
उसका यह आंदोलन किसी दल या राजनीति से प्रेरित नहीं, भविष्य की उम्मीद से प्रेरित है।
अगर आज सरकारें नहीं चेतीं, तो ये सिर्फ युवाओं की हार नहीं — भारत की भी हार होगी।
निष्कर्ष:
यह समय है “काम करने का, जवाब देने का, और युवाओं का भरोसा लौटाने का।”
क्योंकि जब एक देश अपने युवाओं को निराश करता है, तो उसका भविष्य भी सवालों में घिर जाता है।