Site icon TAJAKHABAR

2025 में भी गांव सड़क, बिजली और पानी से वंचित

2025 में भी गांव सड़क, बिजली और पानी से वंचित: बस्तर के अंदरूनी इलाकों से विकास की हकीकत

जहां एक ओर सरकारें स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया की बात कर रही हैं, वहीं बस्तर के कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं जैसे बिजली और पानी से कोसों दूर हैं। जिले के एक अंदरूनी गांव की जमीनी हकीकत देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह गांव आज भी आज़ादी के शुरुआती दशकों जैसा जीवन जीने को मजबूर है।

 

इस गांव में बिजली नहीं है, पीने का पानी नहीं है, सड़कें कीचड़ में डूबी हैं, और आंगनवाड़ी केंद्र में पानी की सप्लाई तक नहीं है। गांव के बीचोंबीच एक नाला बहता है, लेकिन उस पर आज तक कोई पुलिया नहीं बनाई गई। बारिश के मौसम में नाला इतना लबालब भर जाता है कि गांव दो हिस्सों में बंट जाता है – लोग अपने ही रिश्तेदारों के घर नहीं पहुंच पाते।

ग्रामीण बताते हैं कि दो वर्ष पहले जब कलेक्टर विजय दयाराम साहब पदस्थ थे, तब आला अधिकारी यहां निरीक्षण करने आए थे। दो बार मुआयना हुआ, नक्शे नापे गए, वादे किए गए। लेकिन जैसे ही कलेक्टर का तबादला हुआ, सारी योजनाएं और अधिकारी भी ‘गहरी नींद’ में चले गए।

 

गांव के सचिव का दावा है कि सड़क और पुलिया को लेकर प्रस्ताव ऊपर भेजा गया है, लेकिन स्वीकृति नहीं मिल रही। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक खुद मुख्यमंत्री नहीं आएंगे, तब तक शायद यहां कोई काम नहीं होगा।

पीएम आवास’ शहरों में स्वीकृत, गांव में सिर्फ वादे

ग्रामीणों का आरोप है कि शहरों में तो पीएम आवास योजना के तहत मकानों की झड़ी लगी है, लेकिन अंदरूनी गांवों के गरीब लोगों को उसका लाभ नहीं मिल रहा। यहां अब भी लोग पत्थरों और खपड़ों से बने कच्चे घरों में रहते हैं।

 

बिजली विभाग की मनमानी: शिकायत पर धमकी

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जब वे बिजली की समस्या को लेकर शिकायत करते हैं, तो लाइनमैन धमकाते हैं। कई बार आवेदन देने के बावजूद न तो बिजली के खंभे लगाए गए और न ही ट्रांसफार्मर बदले गए।

 

आंगनबाड़ी में पानी नहीं, सहायिकाएं परेशान

गांव में आंगनबाड़ी भवन तो बना दिया गया है, लेकिन वहां रनिंग वाटर की कोई व्यवस्था नहीं है। गर्मियों में पास के नलकूप भी सूख जाते हैं। सहायिकाओं को मात्र ₹2000-₹2500 मासिक मानदेय मिलता है, जिससे वे बच्चों को खाना बनाकर खिलाएं या पानी का इंतज़ाम करें – यह बड़ा सवाल है।

विकास योजनाएं फाइलों में बंद, ज़मीनी हकीकत बदहाल

ग्रामीणों ने सीईओ, जिला पंचायत, कलेक्टर, और क्षेत्रीय विधायक सभी से गुहार लगाई है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। स्थानीय लोगों ने सवाल उठाया है कि क्या सरकार और प्रशासन के लिए 2025 में भी सीधी सड़कें बनवाना इतना मुश्किल है? और अगर इसी इलाके में कोई मंत्री या विधायक रहते, तो क्या यह हालत होती?

अगर आपके गांव की भी ऐसी ही स्थिति है, तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं।

Exit mobile version