हांदावाड़ा की पुकार: 10 साल से डॉक्टर का इंतज़ार, गांव वालों ने बनाया खुद का अस्पताल, सरकार
(हंदवाड़ा )में नक्सलवाद पर सख्ती की बात तो हो रही है, लेकिन बस्तर के गांवों की बदहाली पर सन्नाटा पसरा हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2026 तक नक्सलियों के सफाए की डेडलाइन तो तय कर दी, लेकिन बस्तर के विकास की कोई टाइमलाइन अब तक सामने नहीं आई है। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि नारायणपुर जिले की पंचायत हांदावाड़ा जैसे गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं – खासकर स्वास्थ्य सेवा के मामले में।
10 साल पुरानी उम्मीद, जो अब भी अधूरी है
हांदावाड़ा गांव में एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद है – लेकिन ये किसी सरकारी योजना के तहत नहीं बना। इसे गांव वालों ने अपने दम पर, अपने पैसों से, मिट्टी और लकड़ी से बनाया। उनका सपना था कि गांव में डॉक्टर आएं और इलाज की सुविधा मिले। लेकिन 10-11 साल बीत गए, न डॉक्टर आया, न दवा, न इलाज।
स्वास्थ्य केंद्र या जानवरों की शरणस्थली?
ये प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अब एक कच्ची झोपड़ी में तब्दील हो चुका है। दरवाज़े टूट चुके हैं, भीतर गाय-बैल घूमते हैं, और फार्मासिस्ट के भरोसे नाम मात्र का इलाज होता है। ग्रामीण बताते हैं कि स्वास्थ्य केंद्र में लाए गए उपकरण धूल खा रहे हैं और ज़्यादातर दवाइयां एक्सपायर हो चुकी हैं।
> “गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी गांव में ही होती है। कोई डॉक्टर आज तक आया नहीं। हमने खुद भवन बनाया था, पर अब वहां दरवाजे भी नहीं बचे।” – एक ग्रामीण
नारायणपुर-दंतेवाड़ा के बीच फंसा हांदावाड़ा
यह गांव दंतेवाड़ा विधानसभा क्षेत्र का पहला मतदान केंद्र है, लेकिन प्रशासनिक रूप से नारायणपुर जिले में आता है। नतीजा ये कि हांदावाड़ा दोनों जिलों की अनदेखी का शिकार है। न नारायणपुर के अफसर यहां झांकते हैं, न दंतेवाड़ा के। ग्रामीणों का कहना है कि नेता सिर्फ चुनाव के वक्त आते हैं, वादे करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं।
पर्यटन की पहचान, लेकिन विकास से वंचित
हांदावाड़ा का जलप्रपात छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश में प्रसिद्ध है। 2014 के बाद से कई कलेक्टर, मंत्री और अफसर यहां जलप्रपात की खूबसूरती निहारने आए, इसी झोपड़ीनुमा स्वास्थ्य केंद्र में भोजन भी किया, लेकिन इलाज की सुविधा देने का वादा आज तक पूरा नहीं हुआ।
अब जबकि गांव तक पक्की सड़क बन चुकी है और नक्सल हिंसा का डर भी नहीं है, सरकारी योजनाएं और डॉक्टर अब तक क्यों नहीं पहुंच पाए? यह सवाल ग्रामीणों की डबडबाई आंखों और टूटी उम्मीदों से झलकता है।
निष्कर्ष
सरकार की फाइलों में हांदावाड़ा अब एक “सुरक्षित गांव” है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यही है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं अब भी सपना बनी हुई हैं।
विकास की बात होती है, तो हांदावाड़ा जैसे गांवों को सिर्फ पर्यटन के नाम पर दिखाया जाता है, विकास की योजनाओं में इनकी कोई जगह नहीं।
काश! नक्सलवाद की तरह बस्तर की बदहाली से लड़ने के लिए भी कोई “डेडलाइन” तय होती।