सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार, बस्तर से लेकर दिल्ली तक मचा हलचल
नई दिल्ली/बस्तर — सुप्रीम कोर्ट ने 18 जुलाई 2025 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आदिवासी महिलाओं को भी पैतृक संपत्ति में पुरुषों के समान अधिकार देने की बात कही है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति जोसेफ मालिया वाकची की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी परंपरा के माध्यम से यह साबित नहीं किया जाता कि महिलाएं संपत्ति की उत्तराधिकारी नहीं हो सकतीं, तब तक संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता का अधिकार लागू रहेगा। इस फैसले ने जहां महिला अधिकारों के पक्षधर लोगों को नई ऊर्जा दी है, वहीं आदिवासी समाज में इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं।
क्या है मामला?
मूल विवाद 1992 में छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से शुरू हुआ, जब एक आदिवासी महिला के उत्तराधिकारियों ने अपने दादा घनश्याम बोंड की संपत्ति में हिस्सा मांगते हुए मुकदमा दायर किया। लेकिन निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट तक, सभी ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि आदिवासी समुदाय में महिलाओं को संपत्ति में अधिकार देने की कोई प्रमाणिक परंपरा नहीं है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन फैसलों को पलटते हुए कहा कि परंपरा तब तक मान्य नहीं मानी जा सकती जब तक वह सिद्ध न हो जाए और अगर वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे कानून में स्थान नहीं दिया जा सकता।
फैसले के मुख्य बिंदु:
आदिवासी महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलेगा।
कोई परंपरा यदि महिलाओं को वंचित करती है, तो उसका प्रमाण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी उस पक्ष की होगी जो इसका विरोध कर रहा है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता और भेदभाव-निवारण के अधिकार सर्वोपरि हैं।
परंपराएं समय के साथ बदलती हैं; उन्हें पत्थर की लकीर नहीं माना जा सकता।
बस्तर से उठी विरोध की आवाज़ें
बस्तर और अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में इस फैसले ने सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। कई वरिष्ठ आदिवासी नेताओं ने कहा कि वे इस फैसले की समीक्षा करेंगे और जरूरत पड़ी तो इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे।
एक आदिवासी नेता ने कहा:
> “हमारी सामाजिक व्यवस्था में जमीन को ‘कुल की संपत्ति’ माना जाता है। ये संपत्ति न तो किसी एक व्यक्ति की होती है और न ही एक कुल से दूसरे कुल में ट्रांसफर हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शायद हमारे कस्टमरी लॉ की गहराई को नहीं समझा।”
एक पक्ष यह भी: “फैसला समय की मांग”
वहीं, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला अधिकार संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि आदिवासी महिलाओं को दशकों से उत्तराधिकार से वंचित किया गया और अब संविधान का संरक्षण उन्हें बराबरी का दर्जा देगा।
एक कार्यकर्ता ने कहा:
“यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि आदिवासी महिलाओं की गरिमा और स्वतंत्रता की ओर एक बड़ा कदम है।”
क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?
यह फैसला न केवल एक परिवार या एक महिला से जुड़ा है, बल्कि यह आदिवासी समाज की जटिल परंपराओं, कस्टमरी लॉ और भारतीय संविधान के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता है। साथ ही यह यह भी दर्शाता है कि अगर परंपराएं मौलिक अधिकारों के विरुद्ध जाती हैं, तो उन्हें बदलना समय की मांग है।
भविष्य की राह: समाज बनाम संविधान
इस फैसले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या भारतीय संविधान आदिवासी समुदाय की परंपराओं से ऊपर है? यह सवाल अब अदालतों में नहीं, बल्कि पंचायतों, ग्राम सभाओं और संसद तक गूंजेगा।
आदिवासी नेताओं का कहना है कि वे भारत सरकार से यह अपील करेंगे कि उनके सामाजिक कानून, खासकर भूमि के अधिकारों को, समान नागरिक संहिता जैसी योजनाओं में शामिल न किया जाए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आदिवासी समाज में महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक नई बहस की शुरुआत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि समाज इस फैसले को कैसे आत्मसात करता है – परिवर्तन की दिशा में एक कदम या परंपरा की रक्षा के लिए एक संघर्ष?