प्रकाश प्रदूषण:स्वास्थ्य, पर्यावरण और नींद की लय को गंभीर नुकसान

प्रकाश प्रदूषण:

प्रकाश प्रदूषण: शहरी रोशनी में छिपा एक खामोश खतरा रात के उजाले में छुपा अंधकार: स्वास्थ्य, पर्यावरण और नींद की लय को गंभीर नुकसान

प्रकाश प्रदूषण:स्वास्थ्य, पर्यावरण और नींद की लय को गंभीर नुकसान रात के उजाले में छुपा अंधकार जहाँ एक ओर देश के शहर तेज़ी से विकास की रफ़्तार पकड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक नया और कम चर्चा में आने वाला खतरा चुपचाप बढ़ता जा रहा है — प्रकाश प्रदूषण। स्ट्रीट लाइट्स, डिजिटल होर्डिंग्स, कार्यालयों की चमकती इमारतें और घरों में देर रात तक जलती तेज लाइटें अब सिर्फ सुविधा या सौंदर्यीकरण का प्रतीक नहीं रहीं, बल्कि हमारे जैविक संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन चुकी हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम रोशनी के अत्यधिक उपयोग से मनुष्यों की सर्कैडियन लय यानी प्राकृतिक जैविक घड़ी गड़बड़ा जाती है, जिससे नींद की गुणवत्ता में गिरावट, हार्मोनल असंतुलन, तनाव, मोटापा और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं।

व्यक्तिगत अनुभव से उभरा बड़ा सवाल

एक मामला हाल ही में दिल्ली में सामने आया, जहाँ एक 38 वर्षीय महिला को लंबे समय से थकान, अनियमित मासिक धर्म और चिड़चिड़ापन जैसी परेशानियां हो रही थीं। जांच में सामने आया कि महिला की परेशानी की वजह उनका कार्य वातावरण और आवासीय क्षेत्र में अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश था। महिला एक कॉल सेंटर में रात की शिफ्ट में काम करती थीं और उनका घर एक बड़े डिजिटल बिलबोर्ड के ठीक सामने था। डॉक्टरों ने बताया कि लगातार उजाले में रहने से उनका मेलाटोनिन हार्मोन प्रभावित हुआ था, जिससे उनकी नींद की लय और शारीरिक क्रियाएं असंतुलित हो गईं।

वैज्ञानिक चेतावनी: नींद में रुकावट, सेहत पर असर

अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार, सफेद एलईडी लाइटें पारंपरिक पीली लाइट्स की तुलना में जैविक घड़ी पर पांच गुना अधिक प्रभाव डालती हैं। मेलाटोनिन हार्मोन नींद लाने के साथ-साथ इम्यून सिस्टम, कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण और मानसिक संतुलन में भी अहम भूमिका निभाता है।

वहीं, एक अन्य अध्ययन, जो जर्नल ऑफ अर्बन मैनेजमेंट में 2022 में प्रकाशित हुआ, यह दर्शाता है कि भारत में 16 से 65 वर्ष की उम्र के अधिकांश लोग प्रकाश प्रदूषण के प्रति सजग नहीं हैं, जबकि यही वर्ग देर रात तक स्क्रीन या तेज रोशनी वाले वातावरण में सबसे ज़्यादा सक्रिय रहता है।

पेड़ों, जानवरों और तारे भी हो रहे प्रभावित

प्रकाश प्रदूषण सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्काई ग्लो यानी रात के आकाश में कृत्रिम रोशनी के फैलाव के कारण न केवल तारे कम दिखाई देते हैं, बल्कि यह पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की प्राकृतिक जीवनचक्र प्रणाली को भी प्रभावित कर रहा है। रात के अंधेरे की अनुपस्थिति से वन्यजीवों की प्रवृत्तियां, भोजन, प्रजनन और निद्रा चक्र बुरी तरह बिगड़ रहे हैं।

रोशनी की ग़लत दिशा, ज़्यादा नुकसान

शहरों में स्ट्रीट लाइट और सुरक्षा लाइटें अक्सर ऐसी दिशा में लगाई जाती हैं जिससे रोशनी ऊपर और आसपास फैलती है, जबकि आवश्यकता नीचे सड़क पर होती है। इससे बिजली की बर्बादी तो होती ही है, साथ ही प्रकाश अतिक्रमण (light trespass) और चकाचौंध (glare) की समस्याएं भी बढ़ती हैं।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए उपायों में सबसे महत्वपूर्ण है लाइट हाइजीन यानी प्रकाश स्वच्छता का पालन:

रात को गहरे पर्दे लगाना

आंखों पर नींद का मास्क पहनना

मोबाइल, टीवी और अन्य स्क्रीन से दूरी बनाना

नीली रोशनी से बचाव

ज़रूरत भर की रोशनी का प्रयोग और दिशा में सुधार

निष्कर्ष: रोशनी का अंधेरा

प्रकाश का आविष्कार इसीलिए हुआ था ताकि वह अंधकार को दूर कर सके, लेकिन आज वही रोशनी हमारे भीतर अंधकार पैदा कर रही है — शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर। अगर समय रहते इस अनदेखे प्रदूषण को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह विकास की दौड़ में छिपा एक धीमा ज़हर बन जाएगा।

 

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