नितिन गडकरी की चेतावनी: “खाली पेट को दर्शन नहीं सिखाया जा सकता”, भारत में बढ़ती आर्थिक असमानता पर गंभीर सवाल
शनिवार को नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान केंदीय मंत्री नितिन गडकरी ने देश में बढ़ती आर्थिक असमानता पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज भारत में धन कुछ गिने-चुने अमीरों के पास सिमटता जा रहा है, और यह केंद्रीकरण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। उन्होंने अर्थव्यवस्था के “अनियंत्रित केंद्रीयकरण” को लोकतंत्र और समाज के लिए खतरा बताया और कहा कि यदि ग्रामीण भारत को सशक्त नहीं किया गया, तो यह असंतुलन और भी गहरा हो जाएगा।
गडकरी ने स्वामी विवेकानंद के कथन को दोहराते हुए कहा, “खाली पेट को दर्शन नहीं सिखाया जा सकता”। उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था को इस तरह से विकसित किया जाना चाहिए कि वह रोजगार सृजित करे और ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करे। उन्होंने आंकड़ों के आधार पर बताया कि देश की 65 से 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में उनका योगदान मात्र 12 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि गांवों में रहने वाले करोड़ों लोगों के पास खर्च करने की क्षमता ही नहीं बची है।
केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण
नितिन गडकरी ने ज़ोर दिया कि धन का विकेंद्रीकरण ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि सिर्फ कुछ शहरों या बड़े उद्योगपतियों के पास संसाधन केंद्रित होना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। इस मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह वही रास्ता है जिस पर 1980 के दशक में रीगन-थैचर युग ने दुनिया को मोड़ा था—जहां सरकारें सिर्फ शासन करती थीं, कल्याणकारी जिम्मेदारियों से पीछे हट गई थीं।
भारत भी इस नीति से अछूता नहीं रहा। नई आर्थिक नीतियों के तहत सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्रों से धीरे-धीरे हाथ खींच लिए और यह जिम्मेदारी बाज़ार पर डाल दी। नतीजा यह हुआ कि भारत में भी अमीर और अमीर, गरीब और गरीब होते गए।
आंकड़े गवाही दे रहे हैं
ओक्सफैम और टाइम मैगज़ीन की रिपोर्ट्स दर्शाती हैं कि भारत के शीर्ष 1% लोगों के पास देश की 40.1% संपत्ति है, जबकि नीचे के 50% लोगों के पास महज़ 6.4%। देश की 57.7% आय पर सिर्फ 10% लोगों का कब्ज़ा है। यह असमानता उस दौर से भी अधिक हो गई है जब भारत पर ब्रिटिश राज था।
वित्तीय विश्लेषक हार्दिक जोशी के अनुसार, अमीरों के पक्ष में टैक्स नीति, मजदूरों के लिए कमजोर सुरक्षा और कंपनियों का बाजार पर बढ़ता एकाधिकार इस असमानता को बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत में अप्रत्यक्ष करों की दर ज्यादा है, जो आम लोगों पर अधिक बोझ डालती है, जबकि अमीर वर्ग इससे बच निकलता है।
गरीबी के आंकड़ों की बाजीगरी
भारत सरकार ने हाल ही में दावा किया कि पिछले 10 वर्षों में 17.1 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर निकल गए हैं। यह दावा वर्ल्ड बैंक की नई रिपोर्ट पर आधारित है, जिसने गरीबी रेखा को प्रतिदिन $3 (PPP के आधार पर) माना है। हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर गढ़ा गया है, और हकीकत में ₹62 प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर माना जा रहा है। क्या सच में ₹62 प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीबी से बाहर निकल गया?
उदित मिश्रा, इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार, ने अपने लेख में लिखा है कि ये आंकड़े केवल गरीबी की परिभाषा बदलकर वास्तविकता को छिपाने की कोशिश हैं। यदि पुराने मानकों पर गणना की जाए, तो भारत में गरीबी की स्थिति अभी भी गंभीर है।
चुनाव, चंदा और पूंजी
चुनावी फंडिंग भी इस असमानता को बढ़ाने का एक बड़ा कारण बन गई है। चुनावी बॉन्ड के मामले में सामने आया कि किस तरह से बड़ी कंपनियां राजनीतिक दलों को चंदा देकर नीतियों को अपने पक्ष में प्रभावित करती हैं। इससे आम जनता और ज्यादा पीछे छूट जाती है।
बदलाव की ज़रूरत
नितिन गडकरी के बयान और हालिया आंकड़े मिलकर एक गंभीर सच्चाई को सामने लाते हैं—भारत में गरीबी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक मानव निर्मित समस्या है। और जब समस्या इंसान द्वारा बनाई गई है, तो उसका समाधान भी जन-जागरूकता और नीति-परिवर्तन से ही संभव है।
यदि वास्तव में “सबका साथ, सबका विकास” चाहिए, तो केवल नारे नहीं, नीतिगत क्रांति की ज़रूरत है। और यह तभी मुमकिन है जब देश का हर नागरिक यह सवाल पूछना शुरू करे—यह व्यवस्था आखिर किसके लिए है?