हिड़वा मांझी कॉलेज: दंतेवाड़ा के जंगलों में एक प्राइमरी स्कूल में चल रहा कॉलेज, शिक्षा व्यवस्था की हकीकत से पर्दा हटाता है
दंतेवाड़ा के जंगलों में एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार हर मंच से यह दावा करती है कि राज्य शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू रहा है। बजट में पीएम श्री स्कूल योजना के लिए ₹227 करोड़, स्कूल निर्माण के लिए ₹30 करोड़, और 25 कॉलेजों को उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए ₹75 करोड़ का प्रावधान किया गया है। दूसरी तरफ, जब सच्चाई के पन्ने पलटते हैं, तो शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा चिंताजनक नजर आती है।
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के कटे कल्याण ब्लॉक में स्थित हिड़वा मांझी शासकीय महाविद्यालय आज भी एक इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल की चारदीवारी में संचालित हो रहा है। यह वही दंतेवाड़ा है, जिसे सरकार “एजुकेशन हब” बताने में गर्व महसूस करती है। लेकिन इस कॉलेज की हालत देखकर किसी भी जिम्मेदार नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा।
2017 में स्वीकृति, 2025 तक अधूरी इमारत
यह कॉलेज 2017 में स्वीकृत हुआ था। आठ साल गुजर गए, लेकिन कॉलेज की इमारत अब तक अधूरी है। शुरुआती चरण में बजट मंजूर हुआ, टेंडर की प्रक्रिया पूरी हुई, और निर्माण शुरू भी हुआ, लेकिन कुछ पिलर खड़े होने के बाद काम बंद हो गया। ठेकेदार ने निर्माण अधूरा छोड़ दिया।
दंतेवाड़ा कलेक्टर कुणाल दुदावत ने सीजी खबर को बताया कि कॉलेज भवन का पुराना निर्माण कार्य रद्द कर दिया गया है और अब नए सिरे से टेंडर निकाला जाएगा।
एक कॉलेज, चार कमरे, ना लैब, ना पुस्तकालय
इस कॉलेज में पढ़ाई का जिम्मा केवल एक नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर और एक महिला लेक्चरर के कंधों पर है। बाकी का काम गेस्ट लेक्चरर्स से चलाया जाता है, जिनकी नियुक्ति और उपस्थिति अनियमित है। कॉलेज की स्वीकृत क्षमता 270 सीटों की है, लेकिन इस सत्र में मात्र 25 छात्रों ने दाखिला लिया, और कुल नामांकित छात्र 89 हैं।
कॉलेज के पास खुद की बिल्डिंग नहीं है। कॉलेज के संचालन के लिए इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल, बटापाड़ा के चार छोटे कमरों का उपयोग किया जा रहा है—जिनमें से एक स्टाफ रूम, एक कक्षा, एक अस्थाई लैब और एक ऑफिस के रूप में काम में लिया जाता है।
बिना खेल मैदान, पानी और शौचालय के जगह तक नहीं
कॉलेज और प्राइमरी स्कूल एक ही कैंपस में चलते हैं। प्राइमरी स्कूल के शिक्षक बताते हैं कि कॉलेज के बड़े छात्रों के कारण छोटे बच्चे खेल नहीं पाते और अक्सर उन्हें पेड़ के नीचे बैठना पड़ता है। स्कूल में खेल मैदान, पेयजल व्यवस्था, शौचालय और पुस्तकालय जैसी मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं।
हॉस्टल भी अधूरा
कॉलेज के साथ हॉस्टल निर्माण भी प्रस्तावित था। इसके लिए भी बजट आवंटित हुआ और निर्माण शुरू हुआ। PWD विभाग के अनुसार, एक हॉस्टल भवन लगभग तैयार है, जबकि दूसरा बीच में अधर में लटक गया है।
यह सिर्फ एक कॉलेज की कहानी नहीं
कटे कल्याण और सुकमा के बीच के 70 किलोमीटर के दायरे में यह एकमात्र कॉलेज है। आसपास के दर्जनों गांवों के बच्चों के लिए यह कॉलेज उच्च शिक्षा की एकमात्र उम्मीद था। यदि यहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और हॉस्टल की व्यवस्था होती, तो छात्रों को सुकमा, दंतेवाड़ा या जगदलपुर नहीं जाना पड़ता।
लेकिन आज स्थिति यह है कि राजनीति, ठेकेदारों की लापरवाही और सरकारी उदासीनता के कारण यह कॉलेज एक प्रतीक बन चुका है—कैसे आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है।
निष्कर्ष
सरकारी कागज़ों में कॉलेज, सीटें, स्टाफ और बजट तो दिखते हैं—but ज़मीन पर बच्चों को प्राइमरी स्कूल में पढ़ने को मजबूर होना पड़ रहा है। आठ वर्षों में केवल पिलर खड़े हुए हैं, लेकिन व्यवस्था अब भी ढहने की कगार पर है।
सरकार को चाहिए कि वह जिला मुख्यालय से दूर इन शिक्षा केंद्रों के लिए विशेष नीति बनाए, समयबद्ध निर्माण कार्य सुनिश्चित करे और आदिवासी छात्रों के लिए आवासीय व गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक व्यवस्था सुनिश्चित करे।
जब तक व्यवस्था जमीनी हकीकत से टकराने का साहस नहीं करेगी, तब तक शिक्षा केवल पोस्टर और विज्ञापन तक सीमित रह जाएगी।