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छत्तीसगढ़, में पाठ्य पुस्तक निगम पर सवाल

छत्तीसगढ़

निजी स्कूलों का पाठ्यपुस्तक निगम के खिलाफ प्रदर्शन: स्कैनिंग व्यवस्था के खिलाफ उठी आवाज,

4 जुलाई 2025 – छत्तीसगढ़ के निजी स्कूल संचालकों ने आज पाठ्यपुस्तक निगम के कार्यालय का घेराव करते हुए जमकर विरोध प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन किताब वितरण व्यवस्था में अव्यवस्था और भेदभाव को लेकर किया गया। निजी स्कूलों के शिक्षक और प्रतिनिधि बड़ी संख्या में निगम कार्यालय पहुंचे और अपनी समस्याओं को लेकर आवाज बुलंद की।

📚 क्या है मामला?

पाठ्यपुस्तक निगम ने इस वर्ष एक नया नियम लागू किया है, जिसके तहत स्कूलों को किताबें लेने से पहले स्कैनिंग प्रक्रिया से गुजरना होगा। निगम द्वारा तय किया गया है कि किताबें तभी दी जाएंगी जब निजी स्कूलों के कर्मचारी डिपो पहुंचकर पुस्तकों की स्कैनिंग करेंगे। इसके बाद ही गेट पास जारी होगा और फिर स्कूल अपने संस्थानों तक किताबें ले जा सकेंगे।

🚫 निजी स्कूलों की आपत्तियां

निजी स्कूलों का कहना है कि यह व्यवस्था न केवल अव्यवस्थित है, बल्कि निजी स्कूलों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार भी है। जहां सरकारी स्कूलों को पहले ही किताबें स्कूल तक पाठ्यपुस्तक वितरण में भेदभाव और स्कैनिंग अव्यवस्था को लेकर निजी स्कूलों ने छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम के खिलाफ प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारी स्कूलों की मुख्य मांगे:

1. ब्लॉक या जिला स्तर पर पुस्तक वितरण हो।

2. स्कैनिंग की सुविधा स्कूल या जिले स्तर पर दी जाए।

3. UDISE नंबर के अनुसार किताबें मुहैया कराई जाएं।

 

🧾 क्या कहता है निजी स्कूल संगठन?

प्रदर्शन कर रहे स्कूल संचालकों ने कहा कि यदि तीन दिन के भीतर इन मांगों पर निर्णय नहीं लिया गया, तो राज्य के किसी भी डिपो से कोई स्कूल किताबें नहीं उठाएगा। “अगर निगम ने समाधान नहीं निकाला, तो ये किताबें उनके लिए ही मुबारक रहें। हम अगले साल यही किताबें उपयोग में लाएंगे, क्योंकि किताबें खराब नहीं होतीं,” संगठन ने चेतावनी दी।

🧑‍🏫 शिक्षकों को हो रही हैं परेशानियां

महिला शिक्षकों ने बताया कि डिपो में कोई मूलभूत सुविधा नहीं है – न शौचालय, न बैठने की व्यवस्था, न ही जलपान की। कई बार स्कैनिंग के चलते देर रात तक रुकना पड़ता है, जो महिला शिक्षकों के लिए असुरक्षित है। इसके अलावा, स्कैनिंग सर्वर बार-बार डाउन हो जाता है, जिससे किताबें समय पर स्कूल नहीं पहुंच पा रही हैं।

⚠️ शिक्षा पर पड़ रहा असर

चूंकि स्कूल 16 जून से शुरू हो चुके हैं, किताबों की अनुपलब्धता के कारण पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। शिक्षकों का कहना है कि स्कैनिंग के लिए कर्मचारियों को भेजने के चलते स्कूल बंद करने की नौबत आ रही है।

❓ क्या है स्कैनिंग सिस्टम की खामी?

पहली बार लागू हुए स्कैनिंग सिस्टम में एक-एक किताब को स्कैन करना अनिवार्य कर दिया गया है। कई बार एक ही किताब को दो स्कैनर से स्कैन करने की जरूरत पड़ रही है। इससे समय की बर्बादी हो रही है और पूरी प्रक्रिया धीमी हो गई है।

🏫 सरकारी बनाम निजी स्कूलों में भेदभाव?

निजी स्कूल संचालकों का आरोप है कि सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता देते हुए किताबें सीधे स्कूल पहुंचाई गई हैं, लेकिन निजी स्कूलों को डिपो बुलाकर, स्कैनिंग के झंझट में डाला गया है। उनका कहना है कि ये बच्चों के साथ भेदभाव है, जबकि सभी बच्चे एक जैसे हैं – फिर चाहे वो सरकारी स्कूल में पढ़ें या निजी स्कूल में।

 

📣 निष्कर्ष

पाठ्यपुस्तक वितरण में भेदभाव और स्कैनिंग अव्यवस्था को लेकर निजी स्कूलों ने छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम के खिलाफ प्रदर्शन किया। निजी स्कूल एसोसिएशन की यह नाराजगी केवल व्यवस्थागत असंतुलन नहीं है, बल्कि यह शासन से बराबरी की मांग है। यदि तीन दिनों में शासन और पाठ्यपुस्तक निगम ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया, तो यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है, जिससे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर और अधिक असर पड़ने की आशंका है।

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