छत्तीसगढ़ में ऑयल पाम की खेती,

छत्तीसगढ़ में ऑयल पाम की खेती

छत्तीसगढ़ में ऑयल पाम की खेती: सुनहरे वादे या पर्यावरणीय खतरा?

छत्तीसगढ़ सरकार एक बार फिर कृषि में बड़े बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इस बार फोकस है ऑयल पाम की खेती पर। दावा किया जा रहा है कि इससे किसानों की आमदनी में तीन से पांच गुना तक इज़ाफा होगा। अनुदान, तकनीकी मदद और बिक्री की गारंटी जैसे पावरफुल वादों के साथ राज्य सरकार ‘खेती में क्रांति’ लाने की बात कर रही है।

लेकिन क्या यह क्रांति सचमुच किसानों को समृद्धि की ओर ले जाएगी या फिर यह बस्तर के विफल ‘पाइन प्रोजेक्ट’ की तरह एक और विकास का अंधा प्रयोग साबित होगा?

 

वर्ल्ड बैंक और पाइन प्रोजेक्ट: बस्तर की चेतावनी

1970-80 के दशक में बस्तर में वर्ल्ड बैंक की मदद से ‘एमपी फॉरेस्ट्री टेक्निकल असिस्टेंट प्रोजेक्ट’ शुरू हुआ था। इसके तहत कुरुड़ी क्षेत्र में 3,100 हेक्टेयर में पाइन के पेड़ लगाए गए। पाइन विदेशी प्रजाति थी जो स्थानीय जलवायु के लिए अनुपयुक्त साबित हुई। परिणामस्वरूप जैव विविधता का ह्रास, आदिवासी समुदायों की आजीविका पर चोट और पारिस्थितिकी असंतुलन जैसे नतीजे सामने आए। अंततः इस परियोजना का दुखद अंत हो गया और यह एक विफल मॉडल के रूप में याद किया जाने लगा।

 

अब बारी पाम ऑयल की: संभावनाएं और सच्चाई

छत्तीसगढ़ सरकार अब पाम की खेती को बढ़ावा देने के लिए मैदान में उतरी है।

प्रति हेक्टेयर 143 पौधों के लिए ₹8,000 की सब्सिडी।

पहले चार सालों तक ₹5,250 रखरखाव और ₹2,625 टॉप अप सहायता।

केंद्र और राज्य मिलकर देंगे तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार की गारंटी।

इन योजनाओं से जुड़ा सरकारी दावा है – “पाम से किसानों की आय स्थायी रूप से बढ़ेगी और देश में खाद्य तेलों की आत्मनिर्भरता को मजबूती मिलेगी।” भारत सालाना करीब 50,000 करोड़ रुपये का पाम ऑयल आयात करता है, और सरकार चाहती है कि इसका घरेलू उत्पादन बढ़े।

 

पाम ऑयल का व्यापक उपयोग: सुनहरी उम्मीद

पाम ऑयल न केवल खाने के तेल के रूप में उपयोग होता है, बल्कि यह टूथपेस्ट, साबुन, शैंपू, बायोफ्यूल, कॉस्मेटिक और चॉकलेट जैसी चीजों में भी प्रयुक्त होता है।

दुनिया में हर साल 8 करोड़ टन पाम ऑयल का उत्पादन होता है। ऐसे में यह खेती किसानों के लिए कमाई का नया जरिया बन सकती है।

 

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है...

इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में पाम की खेती के चलते जंगलों का व्यापक विनाश, वन्य जीवों का अस्तित्व संकट, और स्थानीय समुदायों का विस्थापन हुआ है। Global Forest Watch के अनुसार, सिर्फ इंडोनेशिया में 2001 से 2018 के बीच 2 करोड़ हेक्टेयर जंगल खत्म कर दिए गए।

भूजल स्तर नीचे गया

भारत के संदर्भ में बात करें, तो मिजोरम, जहां 2005 से पाम की खेती शुरू की गई, वहां यह योजना आज भी संघर्ष कर रही है।

मिट्टी की गुणवत्ता गिरी

भूजल स्तर नीचे गया

मिल न होने के कारण 48 घंटे के भीतर प्रोसेसिंग चुनौतीपूर्ण बनी रही

किसानों को समय पर पैसा नहीं मिला

वादे अधूरे रहे

 

फिर सवाल उठते हैं…

क्या छत्तीसगढ़ की जलवायु और मिट्टी पाम के अनुकूल है?

क्या बस्तर जैसे क्षेत्रों में यह खेती पारंपरिक आजीविका को नुकसान पहुंचाएगी?

क्या आदिवासी जमीनों पर कब्ज़ा बढ़ेगा?

क्या जल संकट गहराएगा?

 

विशेषज्ञों की चेतावनी: सावधान रहे सरकार

पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि भारत को मलेशिया और इंडोनेशिया जैसी गलती नहीं दोहरानी चाहिए। ऑयल पाम को बहुत अधिक पानी चाहिए होता है, जबकि भारत के कई हिस्सों में बारिश और जलस्तर सीमित हैं।सरकार को सलाह दी गई है कि जंगल न काटे जाएं, बल्कि खाली पड़ी भूमि का ही इस्तेमाल हो।

निष्कर्ष:

छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को पाम की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है, यह योजना किसानों की आमदनी बढ़ाने का सशक्त प्रयास हो सकता है। लेकिन अगर इसमें बस्तर के पाइन प्रोजेक्ट की तरह अंधाधुंध निर्णय, स्थानीय जरूरतों की अनदेखी और पर्यावरणीय प्रभावों की अनदेखी हुई, तो इसके परिणाम विनाशकारी भी हो सकते हैं।

जरूरत है संतुलन की – विकास भी हो, और प्रकृति भी बचे।

वरना आज के फायदे, कल के नुकसान में बदल सकते हैं।

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