छत्तीसगढ़ में आदिवासी शिक्षा की अधूरी कहानी

छत्तीसगढ़

“छत्तीसगढ़ में आदिवासी शिक्षा की अधूरी कहानी: स्कूल तक पहुंच तो है, लेकिन पढ़ाई अब भी मुश्किल”(एक जमीनी रिपोर्ट यूडीआईएसई 2023-24 के आंकड़ों और हकीकत पर आधारित)

छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों की शिक्षा की स्थिति एक गहरी चिंता का विषय बन गई है। यूडीआईएसई (UDISE+) 2023-24 के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि राज्य में छह से दस वर्ष की आयु के 98.3% आदिवासी बच्चे स्कूल में नामांकित तो हो जाते हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते यह संख्या बुरी तरह गिर जाती है।

14 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते केवल चार में से तीन बच्चे ही स्कूल में रह पाते हैं, और 16 से 17 की उम्र में यह आंकड़ा गिरकर आधे से भी कम यानी केवल 49% रह जाता है। लड़कियों के लिए यह प्रतिशत और भी चिंताजनक है—सिर्फ 48.4%।

कमली की कहानी: पढ़ाई की राह में तीन बड़ी दीवारें

यह कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, बल्कि उन हजारों बच्चियों की हकीकत है जो “कमली” जैसी हैं। कमली गोंडी बोलती है, लेकिन उसके स्कूल की किताबें हिंदी में हैं और शिक्षक भी हिंदी में पढ़ाते हैं। भाषा की यह खाई इतनी गहरी है कि शब्द उसकी आंखों के सामने होते हैं, लेकिन उसका अर्थ उसे समझ नहीं आता। किताबें उसके लिए बोझ बन चुकी हैं।

दूसरी दीवार है – स्कूल की दूरी। कमली का स्कूल उसके गांव से 3 किलोमीटर दूर है। उसे जंगल, नदी और पहाड़ी रास्तों से होकर जाना पड़ता है। बारिश में रास्ता कट जाता है और कई दिन स्कूल छूट जाता है।

तीसरी दीवार है – गरीबी की बेड़ियां। कमली की मां कहती है, “बिटिया खेत में थोड़ी देर मदद कर दे, फिर स्कूल चली जाना।” लेकिन खेत से लौटते-लौटते स्कूल का समय निकल जाता है। आखिरकार, पेट की भूख किताबों की भूख पर भारी पड़ जाती है।

छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों की शिक्षा

गिरता नामांकन, कमज़ोर सीखने के परिणाम

राज्य में कुल छात्रों का नामांकन 2018-19 में 59.5 लाख था, जो 2023-24 में घटकर 57.7 लाख रह गया है। वहीं, शिक्षा की गुणवत्ता भी सवालों के घेरे में है।

प्राथमिक स्तर पर राज्य का औसत:

पठन क्षमता: 40.1%

गणित में दक्षता: 34.5%

 

आदिवासी जिलों में ये आंकड़े और भी कम हैं:

पठन: केवल 30.7%

गणित: मात्र 27.07%

 

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जिलों में हालात और भी बदतर हैं, जहां शिक्षक बच्चों की भाषा और संस्कृति से अनभिज्ञ हैं। यही वजह है कि पढ़ाई अब भी एक दूर का सपना है।

 

स्कूल की हालत: जर्जर भवन, बिना बाउंड्री वॉल, या भवन ही नहीं

राज्य के 3789 स्कूल जर्जर हालत में हैं, जबकि 1297 स्कूलों के पास खुद का भवन ही नहीं है। इनमें से कई स्कूल पेड़ों के नीचे, किराए के मकानों में या झोपड़ियों में चलाए जा रहे हैं।

10,719 स्कूलों में बाउंड्री वॉल नहीं है।

प्राथमिक कक्षाओं में ड्रॉपआउट दर 1.8% है, जो सेकेंडरी तक पहुंचते-पहुंचते 16.29% हो जाती है।

यह आंकड़े दर्शाते हैं कि जब स्कूल की इमारत ही नहीं है या वह खतरनाक हालत में है, तब अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने से झिझकते हैं। आखिर कौन मां-बाप जान जोखिम में डालकर बच्चे को पढ़ने भेजेगा?

 

सरकार की प्राथमिकताएं सवालों के घेरे में

सवाल सिर्फ स्कूलों की कमी या शिक्षक अनुपस्थिति का नहीं है, बल्कि सरकार की नीयत और प्राथमिकता का भी है। जब एक ओर स्कूल बंद हो रहे हैं और दूसरी ओर शराब दुकानें धड़ल्ले से खुल रही हैं, तो सरकार की प्राथमिकता को लेकर सवाल उठना लाज़मी है।

बावजूद इसके कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा भाषाई पाठ्यक्रमों में बदलाव की कोशिशें की गई हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में बदलाव की गति बहुत धीमी है। शिक्षकों की तैनाती तो होती है, लेकिन वे स्कूल तक पहुंचते नहीं या फिर पढ़ाने का तरीका आदिवासी सामाजिक और भाषाई संरचना से मेल नहीं खाता।

 

निष्कर्ष: क्या शिक्षा सच में प्राथमिकता है?

छत्तीसगढ़ में शिक्षा से जुड़े बुनियादी सवाल केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं। यह बच्चों के भविष्य, राज्य के विकास और सामाजिक न्याय का सवाल है। जब भाषा, भूगोल और भूख — तीनों शिक्षा के रास्ते में खड़े हों, तो केवल स्कूली नामांकन बढ़ा देना काफी नहीं होता। जरूरत है –

स्थानीय भाषा में पढ़ाई की व्यवस्था,

स्थायी स्कूल भवनों का निर्माण,और समुदाय की भागीदारी से एक समावेशी शिक्षा प्रणाली की।

वरना कमली जैसी लाखों बच्चियां किताबों को कभी समझ ही नहीं पाएंगी — और देश भविष्य की बात केवल कागज़ों में करता रहेगा।

UDISE+ 2023-24, शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़

 

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