छत्तीसगढ़ में आदिवासी टीबी की चपेट में

छत्तीसगढ़ में आदिवासी टीबी की चपेट में

छत्तीसगढ़ में आदिवासी टीबी की चपेट में: हर दिन औसतन 114 नए मरीज, 2025 का लक्ष्य अब भी दूर

छत्तीसगढ़/रायपुर ,भारत सरकार ने 2025 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का संकल्प लिया था, लेकिन छत्तीसगढ़ में हालात इसके बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं। राज्य में हर दिन औसतन 114 टीबी के नए मरीज सामने आ रहे हैं। खास बात यह है कि इन मरीजों में बड़ी संख्या आदिवासी समुदाय की है। 2023 में दर्ज हुए कुल 38,521 मामलों में से 14,289 मामले अकेले आदिवासी समुदाय से थे। यह आंकड़ा न केवल चिंता का विषय है, बल्कि सरकारी दावों पर भी बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

बस्तर बना टीबी हॉट स्पॉट 

राज्य में सर्वाधिक टीबी प्रभावित क्षेत्र आदिवासी बहुल बस्तर है। वर्ष 2025 के पहले छह महीनों में ही बस्तर जिले से 650 से ज्यादा टीबी के मामले सामने आ चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन दोनों इस बढ़ती संख्या से सकते में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, कुपोषण, खराब जीवनशैली और जागरूकता की कमी के कारण टीबी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

 

टीबी: एक पुरानी लेकिन जानलेवा बीमारी

टीबी, जिसे तपेदिक या क्षयरोग भी कहा जाता है, मायकोबैक्टेरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक बैक्टीरिया के कारण फैलता है। यह एक संक्रामक बीमारी है, जो खासकर फेफड़ों को प्रभावित करती है लेकिन शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में टीबी पहले नंबर पर रही है—कोविड-19 के वर्षों को छोड़ दें तो।

टीबी गरीबों की बीमारी क्यों कहलाती है?

टीबी का सीधा संबंध गरीबी और कुपोषण से है। इसका इलाज लंबा और महंगा हो सकता है, खासकर तब जब मरीज को दवाएं खुद खरीदनी पड़ें। छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में मई 2024 में टीबी की दवाएं खत्म हो गई थीं, जिसके बाद मरीजों को मजबूरी में बाजार से दवाएं खरीदनी पड़ीं। यह उस वक्त हुआ जब केंद्र सरकार “टीबी मुक्त पंचायत” की घोषणा कर रही थी। 2023 में राज्य की 2,260 पंचायतों को और 2024 में 4,102 पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित किया गया है — यह संख्या देश में सबसे ज्यादा है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।

 

लक्षणों की पहचान और मुफ्त इलाज

टीबी की शुरुआत सामान्य लक्षणों से होती है:

लगातार खांसी आना

बुखार रहना

वजन का घटना

रात में पसीना आना

खांसी में खून आना

सीने में दर्द

थकान रहना

शरीर में गांठ बनना

भारत में सरकारी अस्पतालों में टीबी की जांच और इलाज मुफ्त में होता है। इलाज के लिए 6 महीने तक एंटीबायोटिक दवाओं की जरूरत होती है। ड्रग रेजिस्टेंस टीबी में इलाज और भी चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि सामान्य दवाएं इसमें असर नहीं करतीं।

 

देश में टीबी के हालात और भारत सरकार का दावा

2023 में देशभर में 25.37 लाख टीबी के मामले दर्ज किए गए, जबकि 2022 में यह संख्या 24.22 लाख थी। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, 2015 के मुकाबले टीबी के मामलों और मौतों दोनों में गिरावट आई है।

2015 में मामलों की दर थी: 237/1 लाख जनसंख्या

2023 में घटकर हुई: 195/1 लाख

मौतों की दर 28 से घटकर 22 प्रति लाख हुई

फिर भी, भारत में आज भी वैश्विक टीबी मामलों का 25% हिस्सा आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी संख्या में टीबी के मामले रिपोर्ट ही नहीं होते, जिससे संक्रमण और फैलता है।

 

स्वास्थ्यकर्मियों में भी ज्यादा खतरा

एक शोध के अनुसार, भारत में प्रति 1 लाख स्वास्थ्य कर्मियों पर औसतन 2,391 टीबी के मामले पाए गए हैं — यह सामान्य जनसंख्या से कहीं अधिक है। यह स्थिति बताती है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में सुरक्षा उपाय अब भी अपर्याप्त हैं।

क्या 2025 तक टीबी मुक्त होगा भारत?

भारत ने वैश्विक लक्ष्य (2030) से 5 साल पहले 2025 तक टीबी को खत्म करने का संकल्प लिया है। लेकिन मौजूदा हालात, खासकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, यह लक्ष्य दूर की कौड़ी लगता है। अगर सरकार पोषण, दवा की उपलब्धता, स्वास्थ्य सुविधाएं और जागरूकता पर ठोस कदम उठाए, तो यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

 

टीबी का मुकाबला सिर्फ दवाओं से नहीं, नीति, नियत और निष्पादन की जरूरत है। जब तक आदिवासी और गरीब आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सेवा नहीं मिलेगी, तब तक टीबी खत्म नहीं होगी।

 

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