गृह मंत्रालय के खिलाफ कोर्ट में लड़ रही हैं भारत की अर्धसैनिक बलें

क्या देश के जवान सम्मान के हक़दार नहीं? गृह मंत्रालय के खिलाफ कोर्ट में लड़ रही हैं भारत की अर्धसैनिक बलें

(गृह मंत्रालय के खिलाफ लड़ाई)क्या आपने कभी सोचा है भारत की सुरक्षा में लगे हमारे सबसे बड़े बल — CRPF, BSF, CISF, ITBP और SSB — सरकार के ही खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा लड़ रहे हैं? ये वही सुरक्षाबल हैं जो सीमाओं की रक्षा से लेकर नक्सलियों से लोहा लेने और भीड़ नियंत्रण तक हर चुनौती में सबसे आगे खड़े होते हैं। लेकिन अब यही फोर्सेस गृह मंत्रालय की नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं।

 

ब्रिटिश दौर से आज तक की कहानी

इस विवाद की जड़ें इतिहास में हैं। 1939 में जब अंग्रेजी हुकूमत थी, तब टैक्स की सुरक्षा के लिए क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस (CRP) बनाई गई थी। 1947 में आज़ादी के बाद, इस बल को भंग नहीं किया गया बल्कि 1949 में इसे CRPF के रूप में पुनर्गठित किया गया। इसके बाद देश में कई अर्धसैनिक बल बने – BSF (1965), ITBP (1962), SSB (1963), CISF (1969) – और इन सभी को मिलाकर CAPF (Central Armed Police Forces) कहा जाने लगा।

गृह मंत्रालय

नेतृत्व का संकट: IPS बनाम CAPF अधिकारी

समस्या की जड़ है सीनियर पदों पर IPS अधिकारियों की नियुक्ति। CAPF में असिस्टेंट कमांडेंट के रूप में भर्ती होकर एक अधिकारी कई सालों तक सेवा करता है, लेकिन प्रमोशन की प्रक्रिया वेकेंसी आधारित होने के कारण उन्हें IG या DG तक पहुंचने का मौका नहीं मिलता। वहीं, IPS अधिकारी डेपुटेशन पर सीधे उच्च पदों पर नियुक्त कर दिए जाते हैं।

DIG रैंक पर 18% पद IPS के लिए रिज़र्व, IG पर 50%, और ADG/DG रैंक तक भी CAPF अधिकारी शायद ही पहुंच पाते हैं। इससे इन बलों में लंबे समय से असंतोष और हताशा की भावना बनी हुई है।

 

कोर्ट की लड़ाई: 2012 से 2025 तक

CAPF अधिकारियों ने 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 2015 में कोर्ट ने CAPF के पक्ष में फैसला दिया और उन्हें “Organized Group A Service” माना। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट गया जहां 2019 में फैसला बरकरार रखा गया। 3 जुलाई 2019 को केंद्र सरकार ने इसे स्वीकार भी किया, लेकिन CAPF का आरोप है कि उन्हें इससे कोई लाभ नहीं मिला।

फिर 2020 में सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर हुई, और 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने CAPF को NFU (Non-Functional Financial Upgradation) का लाभ देने और 2 साल में IPS के डेपुटेशन को समाप्त करने का आदेश दिया।

 

गृह मंत्रालय का रवैया: आदेशों की अनदेखी?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक महीने बाद ही गृह मंत्रालय ने IPS अधिकारी शाश्वत कुमार को SSB में कमांडेंट नियुक्त कर दिया। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, 23 मई से जुलाई 2025 तक 8 IPS अधिकारियों को CAPF में सीनियर पदों पर नियुक्त किया गया है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना की आशंका खड़ी हो गई है।

 

फोर्सेस का पक्ष: ज़मीनी हकीकत को समझने वाले अफसर चाहिए

BSF के पूर्व ADG संजय कृष्ण सूद ने बताया कि CAPF अधिकारी जमीनी स्तर से आते हैं, जवानों के साथ रहते हैं, और ऑपरेशनल चुनौतियों को बेहतर समझते हैं। IPS अफसरों को इस वास्तविकता की जानकारी नहीं होती। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि CAPF अधिकारियों को IPS कैडर में क्यों नहीं भेजा जाता? अगर समन्वय की बात है, तो यह दोनों तरफ से होना चाहिए।

IPS

सरकार का पक्ष: IPS से बेहतर प्रशासनिक तालमेल

सरकार का तर्क है कि राज्य और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय, फोर्सेस की प्रशासनिक क्षमता, और व्यापक राष्ट्रीय नीति के तहत IPS अधिकारियों की नियुक्ति ज़रूरी है। लेकिन इसी तर्क को CAPF अधिकारी चुनौती दे रहे हैं।

 

कोस्ट गार्ड और NSG का उदाहरण

NSG

कोस्ट गार्ड की कमान पहले नेवी से ली जाती थी, अब कोस्ट गार्ड के अपने अधिकारियों को डीजी बनाया जाता है। CAPF भी इसी तरह की मान्यता चाहता है। अब खबर है कि NSG में भी IPS अधिकारियों की नियुक्ति की योजना बनाई जा रही है, जिससे आंतरिक हलचल और बढ़ गई है।

 

ओपन लेटर और चुप्पी

एक CAPF अधिकारी ने प्रधानमंत्री को गुमनाम ओपन लेटर में लिखा – “हम विद्रोही नहीं हैं, हम सैनिक हैं। हमने 19 साल देश सेवा की है। गोलीबारी झेली है। लेकिन हम सिर्फ बलिदान के नहीं, सम्मान के भी हक़दार हैं।”

 

निष्कर्ष: अगली चाल किसकी?

सरकार ने अब 12 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल की है। गेंद अब फिर से कोर्ट के पाले में है। देखना होगा कि क्या न्यायपालिका सरकार को आदेश मानने के लिए बाध्य करेगी या फिर ये मुद्दा फिर लंबी कानूनी लड़ाई में उलझ जाएगा।

 

नोट: CAPF बलों की यह लड़ाई सिर्फ अफसरों के प्रमोशन की नहीं है, यह सम्मान, हक और बराबरी की लड़ाई है। जिन जवानों ने देश की सीमाओं की रक्षा में अपना सब कुछ दे दिया, क्या वे अपने अधिकारों के लिए भी संघर्ष करते रहेंगे?

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