गढ़कलेवा: छत्तीसगढ़ की पारंपरिक स्वाद और महिला सशक्तिकरण की मिसाल
राजधानी रायपुर के रावणभाठा स्थित गढ़कलेवा आज सिर्फ एक भोजनालय नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और महिला सशक्तिकरण का एक जीवंत उदाहरण बन चुका है। गढ़कलेवा की यह यात्रा आठ साल पहले शुरू हुई थी, जब 2014 में इसे सरकार द्वारा स्वयं सहायता समूह को संचालन के लिए सौंपा गया। आज यह स्थान छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का केंद्र बन गया है, जहां स्थानीय स्वाद और पारंपरिक रीतियों की खुशबू एक साथ महसूस की जा सकती है।
गढ़कलेवा का संचालन ” संघ” महिला स्वयं सहायता समूह करती है। इस समूह की अध्यक्ष सरिता शर्मा बताती हैं कि यह स्थान केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी संस्कृति को जीवित रखने और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम है। वर्तमान में लगभग 150 महिलाएं इस समूह से जुड़कर काम कर रही हैं।
गढ़कलेवा: छत्तीसगढ़ी भोजन की आत्मा
गढ़कलेवा का अर्थ होता है “गढ़ का कलेवा”, यानी छत्तीसगढ़ का पकवान। यहां के मेन्यू में छत्तीसगढ़ी नाश्ते से लेकर पूर्ण थाली तक सबकुछ मिलता है। महज ₹25 से शुरू होने वाले व्यंजन जैसे चीला, फरा, गुलगुला, दुस्का बड़ा, उड़द बड़ा, आदि न केवल स्वाद में लाजवाब हैं, बल्कि जेब पर भी भारी नहीं पड़ते।
सरिता शर्मा बताती हैं कि हर त्यौहार पर विशेष पकवान बनाए जाते हैं — चाहे तीजा हो या हरेली, होली हो या दिवाली — हर अवसर पर पारंपरिक मिठाइयों और नमकीनों का विशेष इंतजाम होता है।
स्थानीय नामों से सजी बैठने की व्यवस्था
गढ़कलेवा में बैठने की व्यवस्था को भी छत्तीसगढ़ी रंग में रंगा गया है। “संगवारी” (दोस्त), “गौना” (मेहमान), “फिरोहीन” (सुख-दुख में साथ) जैसे नामों से नामित बैठने की जगहें यहां की लोकसंस्कृति की झलक देती हैं। खाने के साथ-साथ ये नाम एक आत्मीयता और अपनापन का अहसास कराते हैं।
पारंपरिक व्यंजनों की समृद्ध थाली
गढ़कलेवा की खास पहचान उसकी छत्तीसगढ़ी थाली है। मात्र ₹100 में मिलने वाली यह थाली छत्तीसगढ़ के भोजन की समृद्धता को दर्शाती है। इसमें मिलता है:
चौसेला (चावल की पूरी)
अरहर की दाल
कढ़ी (अरबी के पत्तों से बनी)
चावल
चावल से बने पापड़
भाजी, भाटा (बैंगन-आलू की सब्ज़ी), बिजौरी, लाई बड़ी
गेहूं की रोटी
₹150 की स्पेशल थाली में इसके अलावा मीठा आइटम, दही मिर्ची और कुछ विशेष व्यंजन भी शामिल रहते हैं।
भोजन ही नहीं, परंपरा भी
गढ़कलेवा के व्यंजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें पारंपरिक रीति-रिवाजों और त्यौहारों का गहरा संबंध है। गुलगुला, माड़ा पीठा, अरसा, ठेकुआ, जैसे मिठाइयों को खास अवसरों पर बनाया जाता है। सरिता शर्मा बताती हैं कि यहाँ कोई भी आइटम 15 दिन तक बिना केमिकल के खराब नहीं होता।
देशभर में पहचान
गढ़कलेवा की लोकप्रियता अब छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। सरिता जी बताती हैं कि एक भारत, श्रेष्ठ भारत अभियान के तहत जब वे गुजरात गईं तो वहां भी छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की खूब सराहना हुई। आज कई लोग गढ़कलेवा के व्यंजन सीखकर अन्य राज्यों में भी छत्तीसगढ़ी भोजन को प्रमोट कर रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण की प्रेरणा
गढ़कलेवा केवल एक खानपान का स्थल नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की एक मिसाल भी है। शुरुआत में किराया नहीं लिया गया था ताकि महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकें। अब किराया देकर भी यह समूह सफलतापूर्वक संचालन कर रहा है। सरिता शर्मा का कहना है कि “हमारा उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ी खानपान को जन-जन तक पहुंचाना और महिलाओं को रोजगार देना है।”
🏆 गढ़कलेवा क्यों है खास?
✔️ छत्तीसगढ़ी संस्कृति और खानपान को संरक्षित करता है
✔️ महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा
✔️ पारंपरिक रेसिपीज़ को शुद्धता के साथ प्रस्तुत करता है
✔️ जेब पर हल्का, स्वाद में भरपूर
✔️ 100% प्राकृतिक – बिना किसी केमिकल के
निष्कर्ष:
गढ़कलेवा आज छत्तीसगढ़ी संस्कृति, स्वाद और स्त्री सशक्तिकरण का संगम बन चुका है। यह न केवल एक भोजनालय है, बल्कि यह एक ऐसी पहल है जो परंपरा, रोजगार और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा देती है। अगर आप रायपुर आएं, तो गढ़कलेवा की स्वादिष्ट थाली और आत्मीय वातावरण का अनुभव जरूर करें।