कोयले की कीमत पर उजड़ता कोरबा: 29 साल में 60% से ज़्यादा घटा वन क्षेत्र, खनन में बेतहाशा इज़ाफा
देश को सबसे ज़्यादा कोयला देने वाला कोरबा अब खुद संकट में घिर गया है। हाल ही में प्रकाशित एक व्यापक शोध अध्ययन से सामने आया है कि बीते 29 वर्षों में कोरबा जिले में पर्यावरणीय तबाही गंभीर रूप ले चुकी है। रिमोट सेंसिंग और जीआईएस तकनीक के जरिए हुए इस अध्ययन से साफ हुआ है कि जहां साल 1995 में कोरबा में कुल क्षेत्रफल का 35.56% हिस्सा वन था, वो अब घटकर महज 14.6% रह गया है। इसके विपरीत, कोयला खनन क्षेत्र 2.52% से बढ़कर 8.69% तक पहुंच गया है।
यह रिपोर्ट प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल “थ्री फॉर एस एंड पीपल” में प्रकाशित हुई है। अध्ययन को अमरकंटक की इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, ग्राम्य भारती कॉलेज कोरबा, सरगुजा विश्वविद्यालय और ताइवान की नेशनल ताइवान नॉर्मल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया है।
खनन का बढ़ता दायरा, सिमटते जंगल
इस अध्ययन में वर्ष 1995 से 2024 के बीच के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि:
वन क्षेत्र 178.65 वर्ग किमी (35.56%) से घटकर 70.65 वर्ग किमी (14.6%) रह गया।
खनन क्षेत्र 12.65 वर्ग किमी (2.52%) से बढ़कर 43.65 वर्ग किमी (8.69%) हो गया।
कृषि भूमि 18.5% से घटकर 12.1% पर आ गई।
शहरी क्षेत्र और बस्तियां 3.71% से बढ़कर 6.88% हो गईं।
बंजर भूमि 4.79% से बढ़कर 13.35% हो गई।
जल स्रोत भी घटकर 2.24% रह गए।
सरकारी दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
भारत सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि कोयले पर निर्भरता घटाई जा रही है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं। वर्ष 2013-14 में भारत में कोयला उत्पादन 567.765 मिलियन टन था, जो 2023-24 में बढ़कर 997.826 मिलियन टन हो चुका है। कोरबा की गेवरा, दीपका और कुछमुंडा जैसी खदानें अकेले ही देश के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 20% हिस्सा देती हैं, लेकिन इसकी पर्यावरणीय कीमत यहां के जंगल, ज़मीन और लोग चुका रहे हैं।
जंगल से खदान तक: तबाही का नक्शा
अध्ययन में साफ कहा गया है कि कोरबा में कोयला खनन ने भूमि उपयोग और भूमि आवरण के पैटर्न को पूरी तरह बदल डाला है:
वन और कृषि भूमि को खनन स्थलों और शहरी इलाकों में बदल दिया गया है।
इससे जल प्रतिधारण, मिट्टी की उर्वरता और जैव विविधता को गहरा नुकसान पहुंचा है।
ओपन कास्ट खनन भूमिगत खनन की तुलना में 8 से 10 गुना अधिक कचरा पैदा करता है।
ओवरबर्डन डंप (मिट्टी और चट्टानों के ढेर) से भारी धातुओं और विषैले तत्वों का उत्सर्जन हो रहा है।
प्रभावित आजीविका, बढ़ता विस्थापन
कोयला खनन का प्रभाव सिर्फ पर्यावरण पर ही नहीं, स्थानीय समुदायों की आजीविका और सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ा है:
गैर-लकड़ी वन उत्पाद (जैसे महुआ, बांस, औषधीय पौधे) की उपलब्धता घटी, जिससे लोगों की आय पर असर पड़ा।
खनन के कारण कई परिवारों का विस्थापन हुआ और नई बस्तियों का निर्माण हुआ, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ा।
कृषि भूमि के बंजर होने और जल स्रोतों के प्रदूषित होने से किसानों की स्थिति और बदतर हो गई है।
समाधान की राह क्या है?
रिपोर्ट में सुझाए गए उपायों में शामिल हैं:
जैविक खाद, बायोचार, जिप्सम और चूना जैसे संशोधनों से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार।
टेरेस फार्मिंग और चेक डैम के ज़रिए मिट्टी का कटाव रोकना।
आर्थिक और औषधीय पेड़ लगाना, जैसे आम, नीम, आंवला आदि।
सामुदायिक वन प्रबंधन को बढ़ावा देना और आजीविका सृजन के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराना।
ड्रोन और रिमोट सेंसिंग तकनीकों से वन क्षेत्र और जल संसाधनों की निगरानी।
राष्ट्रीय और वैश्विक संदर्भ में कोरबा
भारत ने 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि को पुनर्बहाल करने का लक्ष्य रखा है। कोरबा इस दिशा में एक क्रिटिकल टेस्ट केस साबित हो सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि इस तरह के गंभीर और साक्ष्य-आधारित शोध को सिर्फ प्रकाशित करने के बाद भुला न दिया जाए, बल्कि उसे नीति निर्माण का हिस्सा बनाया जाए।
निष्कर्ष:
कोरबा की कहानी महज कोयले की नहीं, पर्यावरणीय क्षरण, आजीविका संकट और नीतिगत उदासीनता की भी है। कोयले की रोशनी में देश को ऊर्जा तो मिल रही है, लेकिन कोरबा के जंगल, ज़मीन और लोग अंधेरे में डूबते जा रहे हैं। सवाल है – क्या अब भी समय नहीं आया है जब सरकार और समाज, दोनों इस अंधकार की ओर रोशनी से देखें?