अमेरिकन ड्रीम पर ट्रंप की चोट: इंडियन स्टूडेंट्स अब अमेरिका नहीं, कनाडा-जर्मनी की ओर देख रहे है
न्यूयॉर्क से लेकर हैदराबाद तक, एक सवाल हर स्टूडेंट के ज़हन में गूंज रहा है – क्या अमेरिका अब भी पढ़ाई के लिए सबसे बेहतर देश है? डोनाल्ड ट्रंप की ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ नीति का नया अवतार अब भारतीय छात्रों के सपनों पर भारी पड़ रहा है। वीजा नीतियों में कड़ाई, स्कॉलरशिप कटौती और वित्तीय दबाव – इन सभी ने मिलकर इंडियन स्टूडेंट्स को अमेरिका से दूर कर दिया है।
अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या में गिरावट
रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 में अमेरिका में पढ़ने वाले 3.31 लाख भारतीय छात्र वहां के कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का 29.4% थे। लेकिन अब S1 वीजा में 38% की गिरावट देखी गई है, और मार्च से मई 2025 के बीच यह गिरावट 27% तक पहुंच गई है।
वीजा नीतियों में आई सख्ती
अब अमेरिका में वीजा पाना पहले जैसा आसान नहीं रहा। टेक्निकल स्टडीज़ या IT, इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए जाने वाले छात्रों से टेक्निकल इंटरव्यू लिए जा रहे हैं। अमेरिकी इमिग्रेशन विभाग किसी भी आधार पर वीजा रद्द कर सकता है। कई छात्रों को यूनिवर्सिटीज ने ऑफर लेटर वापस कर दिए हैं या वीजा कैंसिल कर दिया गया है।
OPT और H1B वीजा की नई मुश्किलें
अमेरिका में पढ़ाई के बाद काम करने के लिए मिलने वाला OPT (Optional Practical Training) अब सख्ती की जद में है। वहीं, H1B वीजा के लिए अब न्यूनतम वेतन $1,20,000 कर दिया गया है – जो आम भारतीय छात्र के लिए एक बड़ा चैलेंज है।
स्कॉलरशिप और रिसर्च फंडिंग में कटौती
ट्रंप प्रशासन ने DEI (Diversity, Equity, Inclusion) प्रोग्राम्स बंद कर दिए हैं। इससे स्कॉलरशिप, मेंटॉरशिप और रिसर्च फंडिंग के अवसर घटे हैं। खासकर STEM फील्ड के लिए यह एक बड़ा झटका है। पीएचडी, रिसर्च और इनोवेशन में भारत के टैलेंट को अब वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं।
राजनीतिक माहौल और सोशल एक्टिविटी का डर
‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का उग्र राष्ट्रवादी माहौल भारतीय छात्रों के मन में भय पैदा कर रहा है। सोशल मीडिया गतिविधियों तक को अब वीजा इंटरव्यू में आधार बनाया जा रहा है।
पढ़ाई की भारी लागत – अब बनेगी बड़ी बाधा
अमेरिका में पढ़ाई की सालाना लागत $40,000 से $80,000 तक है। DEI स्कॉलरशिप्स हटने के बाद अब मिडल क्लास छात्रों के लिए यह और भी कठिन हो गया है।
अन्य देश क्यों बन रहे हैं पहली पसंद?
कनाडा, जर्मनी, यूके, ऑस्ट्रेलिया, और सिंगापुर जैसे देश भारतीय छात्रों को अपनी लचीली वीजा पॉलिसी, कम लागत और वर्क परमिट विकल्पों से आकर्षित कर रहे हैं:
कनाडा: PGWP यानी पोस्ट ग्रेजुएशन वर्क परमिट और PR (Permanent Residency) का आसान रास्ता।
जर्मनी: पब्लिक यूनिवर्सिटी में ट्यूशन फ्री एजुकेशन और EU ब्लू कार्ड स्कीम।
यूके: ग्रेजुएट रूट वीजा जिसके तहत 2 साल तक काम करने की छूट।
ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड: आसान PR प्रक्रिया और स्कॉलरशिप विकल्प।
चीन: AI और मेडिसिन जैसे क्षेत्रों में भारत से हर साल 30,000 छात्र जा रहे हैं।
भारत पर इसका असर
फॉरेन स्टडी एनालिसिस ग्रुप ‘लॉरेन फाइनेंस’ की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन 18,000 अवैध भारतीय प्रवासियों को वापस भेजने की तैयारी में है। इससे भारत सरकार पर पुनर्वास का अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
वहीं, अमेरिका में भारतीय छात्रों का योगदान $43.8 बिलियन है, और वहां की नौकरियों में करीब 3.78 लाख भारतीय छात्र सक्रिय हैं। छात्रों की संख्या में गिरावट से रेमिटेंस फ्लो पर असर पड़ना तय है।
क्या भारत की यूनिवर्सिटीज को मिलेगा मौका?
भारत में कई टॉप इंस्टीट्यूट्स और रिसर्च यूनिवर्सिटीज अब ग्लोबल स्टैंडर्ड पर शिक्षा देने के लिए तैयार हैं। अमेरिका की कठिन नीतियों के चलते अब भारत में ही रहकर पढ़ाई करना भी एक मजबूत विकल्प बनता जा रहा है।
🧭 निष्कर्ष: क्या इंडियन स्टूडेंट्स को डरना चाहिए या दिशा बदलनी चाहिए?
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां निश्चित रूप से इंडियन स्टूडेंट्स के अमेरिकन ड्रीम्स को झटका दे रही हैं, लेकिन यह एक अवसर भी है। अब समय आ गया है कि छात्र सिर्फ अमेरिका पर निर्भर न रहकर दूसरे विकल्पों की ओर भी देखें।
> सपने अगर बड़े हैं, तो रास्ते भी खुद बनते हैं। जरूरत है सही दिशा, स्मार्ट रिसर्च और मजबूत इरादों की।
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क्या अब भी आप अमेरिका को पढ़ाई के लिए सबसे बेहतर विकल्प मानते हैं या आप दूसरे देशों में संभावनाएं देख रहे हैं?