अबूझमाड़: जहां ज़रूरतों से जन्म लेते हैं नया वीचार, आदिवासियों ने बनाया अनोखा पुल
नारायणपुर/अबूझमाड़। भारत के अंतिम जंगलों में से एक – अबूझमाड़, छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले का वो इलाका है, जिसे कभी देश के “अज्ञात क्षेत्र” (Unexplored Territory) के रूप में जाना जाता था। करीब 5000 वर्ग किलोमीटर में फैले इस इलाके को वर्षों तक राजस्व नक्शों में शामिल तक नहीं किया गया था। इसके पीछे मुख्य कारण था — यहां की आदिवासी संस्कृति को संरक्षित करना और बाहरी हस्तक्षेप को रोकना।
अभुजमाड़ एक ऐसा इलाका है जहां कभी घने जंगलों की भरमार थी। हालांकि, आज यहां जंगलों की कटाई दो अलग-अलग वजहों से हो रही है। पहली वजह है आदिवासियों की पारंपरिक ‘ खेती’, जिसमें वे एक जंगल के हिस्से को काटते हैं, आग लगाते हैं, खेती करते हैं और फिर उसे छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। यह एक चक्रीय कृषि प्रणाली है। दूसरी वजह है — सरकारी विकास योजनाएं और माओवादी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए बनाए जा रहे सड़क नेटवर्क, जिनके चलते भारी पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही है।
सरकार से पहले गांव वालों ने खुद बनाई ‘सुविधा की राह’
“जब सरकार नहीं पहुंची, तब गांव वालों ने खुद बना लिया पुल!”
📍 अबूझमाड़ की सच्ची कहानी | आत्मनिर्भरता की मिसाल
इन्हीं सघन वनों और पहाड़ी इलाकों के बीच बसे 200 से अधिक गांवों में आज भी कई सरकारी योजनाएं, स्कूल, अस्पताल और मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंची हैं। वर्षों तक सड़कें नहीं थीं। बारिश के मौसम में नदी-नाले उफान पर होते हैं, जिससे गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है।
लेकिन ज़रूरत जब सिर पर चढ़कर बोलती है, तब आविष्कार जन्म लेते हैं — और यही हुआ है अबूझमाड़ में। जब प्रशासन की ओर से कोई सहायता नहीं मिली, तब आदिवासी समुदायों ने खुद अपने दम पर लकड़ी और बांस से पुलों का निर्माण किया। एक ऐसा ही लकड़ी और बांस का बना पारंपरिक पुल हाल ही में सामने आया, जो तकनीकी दृष्टि से स्थानीय इंजीनियरिंग की मिसाल है। इस पुल में सबसे पहले बांस का गोल घेरा बनाकर उसमें बड़े-बड़े पत्थर डाले गए, जो इसके पिलर (स्तंभ) का काम करते हैं। फिर सूखी लकड़ियों को क्षैतिज तौर पर बिछाया गया और दोनों ओर बांस की बल्लियों से रेलिंग बनाई गई — ताकि महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी सुरक्षित गुजर सकें।
एकता की मिसाल: गांवों ने मिलकर बनाया पुल
इस निर्माण कार्य में एक या दो लोगों की नहीं, बल्कि कई गांवों की सहभागिता रही होगी। यह एकता का प्रतीक भी है और संघर्ष का परिणाम भी। जब सरकारी एजेंसियां नाकाम हो जाती हैं, तब जनसामान्य की सामूहिक शक्ति ऐसे चमत्कारी काम कर दिखाती है। हालांकि यह पुल अब पुराना हो चुका है और इसकी कई लकड़ियां सड़ चुकी हैं, कई बांस की रेलिंग टूट चुकी है, लेकिन फिर भी यह अभी भी मजबूती से खड़ा है। बारिश के मौसम में इसकी मरम्मत कर इसे फिर से उपयोग में लाया जाता है।
आवश्यकता बनी आविष्कार की जननी
इस कहानी से साफ होता है कि “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है” – यह केवल किताबों में लिखी बात नहीं, बल्कि अबूजमाड़ के जंगलों में जीती-जागती सच्चाई है। जब भी ज़रूरत पड़ी, अबूझमाड़ के आदिवासियों ने अपने हाथों से समाधान गढ़े हैं, और यही आत्मनिर्भरता उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में आदिवासी ग्रामीणों ने बिना सरकारी मदद के बांस और लकड़ी से पुल बनाकर एकजुटता और भाईचारा की मिसाल पेश की है।
आखिर में सवाल ये है...
जब आदिवासी समुदाय अपने संसाधनों से, बिना मशीनरी, बिना सरकारी इंजीनियरिंग के इतने मजबूत पुल बना सकते हैं, तो फिर सरकार अब तक इस क्षेत्र में स्थायी बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं पहुंचा पाई? और क्या आने वाले समय में विकास की गाड़ी जंगल को निगले बिना इन जीवनदायिनी नदियों और आत्मनिर्भर गांवों से होकर गुज़रेगी ?