माइनिंग परियोजना से धरसीवा में जंगल, गांव खतरे में

धरसीवा में जंगल, गांव और परंपराएं खतरे में: जिंदल की माइनिंग परियोजना से 10 से अधिक गांव उजड़ने की कगार पर, हरेली पर ग्रामीणों का विरोध प्रदर्शन

छत्तीसगढ़ का सबसे पहला और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण त्योहार हरेली जहां पूरे राज्य में पारंपरिक उत्साह से मनाया जा रहा है, वहीं रायपुर से करीब 46 किलोमीटर दूर धरसीवा विधानसभा क्षेत्र के दर्जनों गांवों में मातम जैसा माहौल है। वजह है— नलवा सीमेंट कंपनी की प्रस्तावित खनन परियोजना, जो इलाके के 10 से अधिक गांवों के अस्तित्व को सीधा खतरा पहुंचा रही है।

माइनिंग

गांव, तालाब, गौठान, स्कूल – सब होंगे तबाह

धरसीवा क्षेत्र के जिन गांवों में यह माइनिंग प्रस्तावित है, वहां की गौठान, तालाब, श्मशान घाट, स्कूल और खेतीहर जमीन पूरी तरह से प्रभावित होने वाली है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह खनन योजना मंजूरी पाती है तो सैकड़ों परिवारों का जीवन उजड़ जाएगा।

यह इलाका खनिज संपदा से भरपूर है। गांव के नीचे मौजूद पत्थरों की भारी मात्रा को कंपनी निकालकर सीमेंट उत्पादन के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। लेकिन इसकी कीमत यहां के स्थानीय निवासी अपनी जमीन, जंगल और जीवनशैली से चुकाएंगे।

जनसुनवाई पर सवाल,

जनसुनवाई पर सवाल, फर्जी ग्राम सभाओं का आरोप

कल यानी 25 जुलाई को जनसुनवाई आयोजित की गई है। लेकिन ग्रामीणों को डर है कि यह जनसुनवाई महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी। पहले भी कई बार ऐसे मामलों में फर्जी ग्राम सभाएं और कागजी सहमति दर्शाकर कंपनियों को हरी झंडी दी गई है।

विरोध में जुटे ग्रामीण

त्योहार छोड़कर विरोध में जुटे ग्रामीण

हरेली जैसे पावन अवसर पर भी, जब हर गांव में पारंपरिक पूजा और उल्लास होता है, धरसीवा के ग्रामीण धरना-प्रदर्शन के लिए एकजुट हो गए हैं। ग्रामीणों की आंखों में डर है—अपने घर, खेत, तालाब और पुश्तैनी जमीन को खोने का डर।

 

सवालों के घेरे में प्रशासन

स्थानीय लोगों का आरोप है कि जनसुनवाई से पहले जानबूझकर असमंजस का माहौल बनाया जा रहा है, ताकि कम से कम लोग शामिल हो पाएं और इसे कागजी सहमति दिखाकर मंजूरी दिलाई जा सके। इसके खिलाफ गांवों में लगातार प्रदर्शन और बैठकें हो रही है

क्या कहता है कानून?

खनन जैसे किसी भी बड़े प्रोजेक्ट से पहले जनहित में पारदर्शी जनसुनवाई और ग्राम सभा की सहमति आवश्यक होती है। लेकिन यदि यह प्रक्रिया फॉर्मेलिटी बन जाए, तो यह संविधान के अनुच्छेद 244 और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम (PESA) की आत्मा के खिलाफ है।

 

निष्कर्ष:

धरसीवा क्षेत्र में जिंदल समूह की इस माइनिंग परियोजना को लेकर ग्रामीणों की चिंता वाजिब है। यह सिर्फ पर्यावरण का नहीं, संस्कृति, जीवन और अस्तित्व का सवाल है। अब देखना होगा कि प्रशासन जनसुनवाई को लेकर कितना पारदर्शी और जवाबदेह रहता है, या फिर एक और “कागजी सहमति” की बली चढ़ती है।

 

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