छत्तीसगढ़ में: क्या शिक्षा सुधार सिर्फ एक भ्रम है?

छत्तीसगढ़

युक्तियुक्तिकरण बनाम शिक्षकों की भारी कमी: क्या छत्तीसगढ़ में शिक्षा सुधार सिर्फ एक भ्रम है?

छत्तीसगढ़ सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत शिक्षकों के युक्तियुक्तिकरण की प्रक्रिया को लागू किया है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना और संसाधनों के बेहतर उपयोग के जरिए प्रत्येक छात्र तक शिक्षा पहुंचाना है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह उद्देश्य वास्तव में हासिल हो रहा है या फिर यह केवल एक प्रशासनिक जुगाड़ है?

क्या है युक्तियुक्तिकरण?

युक्तियुक्तिकरण का अर्थ है कि जहां शिक्षकों की अधिकता है, वहां से उन्हें हटाकर उन स्कूलों में भेजा जाए जहां शिक्षकों की कमी है। राज्य सरकार का दावा है कि इससे दूरस्थ, आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षक उपलब्ध हो सकेंगे और शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी। इस कदम के तहत राज्य में लगभग 45,000 शिक्षकों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया गया।

शिक्षकों का विरोध और शंका

इस निर्णय को लेकर छत्तीसगढ़ शिक्षक साखा मंच के बैनर तले राज्यभर में शिक्षक लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया के जरिए हजारों स्कूलों का विलय कर दिया गया है, जिससे उनके स्वतंत्र अस्तित्व पर संकट आ गया है। शिक्षकों को आशंका है कि युक्तियुक्तिकरण के बहाने लगभग 70,000 पद समाप्त कर दिए गए हैं।

आंकड़े जो सरकार के दावे पर सवाल खड़े करते हैं

विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत रिक्त पदों के आंकड़े बताते हैं कि युक्तियुक्तिकरण के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। उदाहरण के लिए:

बेमेतरा जिले में 30 अप्रैल तक प्राचार्य के 157, व्याख्याता के 883, सहायक शिक्षक के 1526 पद रिक्त थे।

जून 2025 में, यानी युक्तियुक्तिकरण के बाद, भी कोई खास अंतर नहीं आया — प्राचार्य के 157, व्याख्याता के 831, सहायक शिक्षक के 1278 पद रिक्त रहे।

ऐसे ही हालात अन्य जिलों में भी दिखाई देते हैं।

रिक्त पदों में भ्रम और विरोधाभास

बजट सत्र में बताया गया था कि राज्य में 63,063 शिक्षक पद रिक्त हैं, लेकिन जुलाई 2025 के मानसून सत्र में यह संख्या घटकर 25,907 रह गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इस बीच कोई भर्ती प्रक्रिया नहीं हुई। इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि या तो रिक्त पद समाप्त कर दिए गए हैं या फिर कागजों में गुम हो गए हैं।

आदिवासी जिलों की हालत गंभीर

सरकार जहां एक ओर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी बहुल जिलों की स्थिति इस वादे के विपरीत है:

 

सरगुजा संभाग:

बलरामपुर में प्राचार्य के 127, व्याख्याता के 189 और सहायक शिक्षक के 314 पद रिक्त।

सूरजपुर में व्याख्याता के 196 और सहायक शिक्षक के 77 पद रिक्त।

 

बस्तर संभाग:

सुकमा में सहायक शिक्षक के 428 पद खाली।

बीजापुर में 396 पद, नारायणपुर में 64 पद, दंतेवाड़ा में भी कई पद रिक्त।

 

रायपुर और अन्य संभागों में भी खाली पदों की भरमार

राजधानी रायपुर और दुर्ग, बेमेतरा, बलौदाबाजार, महासमुंद जैसे जिलों में भी स्थिति चिंताजनक है:

रायपुर में व्याख्याता के 1995 पद रिक्त हैं।

बलौदाबाजार में प्राचार्य के 193, व्याख्याता के 520 पद खाली हैं।

महासमुंद में शिक्षकों के 763 पद रिक्त हैं।

 

क्या युक्तियुक्तिकरण से कुछ बदला?

नहीं। न तो शिक्षकों की कमी दूर हुई, न ही स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधरा। बल्कि शिक्षकों का कहना है कि युक्तियुक्तिकरण के कारण कई स्कूलों का अस्तित्व खत्म हो गया और उनके भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

 

निष्कर्ष: समाधान क्या है?

युक्तियुक्तिकरण एक व्यवस्था सुधारने का तरीका हो सकता है, लेकिन शिक्षकों की सीधी भर्ती और रिक्त पदों को भरना ही स्थायी समाधान है।

छत्तीसगढ़ सरकार को पारदर्शिता के साथ भर्ती प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए, अन्यथा शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का सपना अधूरा ही रह जाएगा। जब तक स्कूलों में पूरे स्टाफ की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक शिक्षा की जड़ें मजबूत नहीं हो सकतीं।

 

आप क्या सोचते हैं?

क्या युक्ति युक्तिकरण के जरिए शिक्षा सुधारी जा सकती है या यह सिर्फ एक कागजी योजना है? नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर साझा करें।

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